ध्यान-विधि

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यह बड़ी प्यारी विधि है। तुम इसे वैसे ही शुरु कर सकते हो जैसे तुम हो — पहले कोई शर्त पूरी नहीं करनी है।

बहुत सरल विधि है। तुम व्यक्तियों से, वस्तुओं से, घटनाओं से घिरे हो। हर क्षण तुम्हारे चारों ओर कुछ न कुछ है; वस्तुएं हैं, घटनाएं हैं, व्यक्ति हैं — लेकिन क्योंकि तुम सचेत नहीं हो, इसलिये तुम भर नहीं हो। सब कुछ मौजूद है, लेकिन तुम गहरी नींद में सोये हो।

तो तुम्हारे आसपास जो कुछ भी होता है, वही मालिक बन जाता है, तुम्हारे ऊपर हावी हो जाता है और तुम उसके द्वारा खींच लिये जाते हो। तुम उससे प्रभावित ही नहीं होते, संस्कारित भी हो जाते हो। तुम बलशाली नहीं हो, बाकी सब कुछ तुमसे ज्यादा बलशाली है। तुम्हारी भावदशा, तुम्हारा मन, सब दूसरी चीजों पर निर्भर है — विषय तुम्हें प्रभावित कर देते हैं!

चेतना की ऐसी अवस्था पर आना है, जहाँ कुछ भी तुम्हें प्रभावित न करे और तुम निर्लिप्त बने रह सको। यह कैसे हो?

दिन भर इसके लिये अवसर है। किसी भी क्षण तुम सजग हो सकते हो जब तुम्हें कुछ आविष्ट कर रहा है। तब एक गहरी श्वास लो, गहरी श्वास भीतर खींचो, गहरी श्वास बाहर छोड़ो, और उस चीज को फिर से देखो — लेकिन देखो एक साक्षी की तरह, एक द्रष्टा की तरह।

जब भी तुम्हें लगे कि कोई चीज तुम्हें प्रभावित कर रही है, तुम पर हावी हो रही है, तुम्हें तुमसे दूर ले जा रही है, तुमसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो रही है — तो गहरी श्वास लो और छोड़ो। और श्वास बाहर छोड़ने से पैदा हुए उस छोटे से अंतराल में उस चीज की ओर देखो — कोई सुंदर चेहरा, कोई सुंदर शरीर, कोई सुंदर मकान, या कुछ भी।

अगर तुम्हें यह कठिन लगे, अगर श्वास बाहर छोड़ने भर से ही तुम अंतराल पैदा न कर पाओ, तो एक काम और करो — श्वास बाहर छोड़ो, और एक क्षण को श्वास को भीतर लेना रोक लो, रुक जाओ, श्वास भीतर मत लो और उस चीज की ओर देखो।

जब पूरी वायु बाहर है, या भीतर है, जब तुमने श्वास लेना बंद कर दिया है तो कुछ भी तुम्हें प्रभावित नहीं कर सकता। उस क्षण में तुम सेतुहीन हो जाते हो — सेतु टूट जाता है। श्वास ही सेतु है!

इसे करके देखो।

केवल एक क्षण के लिये ऐसा होगा कि तुम साक्षी को अनुभव करोगे, लेकिन उससे तुम्हें स्वाद मिल जायेगा; उससे तुम्हें अनुभव हो जायेगा कि साक्षित्व क्या है। फिर तुम उसकी खोज में आगे बढ़ सकते हो!

~ ओशो
तंत्र-सूत्र

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सहनशीलता

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एक व्यक्ति किसी लुहार के द्वार से गुजरता था।
उसने निहाई पर पड़ते
हथौड़े की चोटों को सुना और भीतर झांककर देखा।

उसने देखा कि एक कोने में
बहुत से हथौड़े टूटकर और विकृत होकर पड़े हुए हैं।
समय और उपयोग ने ही
उनकी ऐसी गति की होगी।

उस व्यक्ति ने लुहार से पूछा,
”इतने हथोड़ों को
इस दशा तक पहुंचाने के लिए कितनी निहाइयों की
आपको जरूरत पड़ी?”

लुहार हंसने लगा और बोला,
”केवल एक ही मित्र,
एक ही निहाई सैकड़ों हथौड़ों को तोड़ डालती है,
क्योंकि हथौड़े चोट करते हैं
और निहाई सहती है।”

यह सत्य है कि अंत में वही जीतता है,
जो चोटों को
धैर्य से स्वीकार करता है।
निहाई पर पड़ती हथौड़ों की चोटों की भांति ही
उसके जीवन में भी
चोटों की आवाज तो बहुत सुनी जाती है,
लेकिन अंतत:
हथौड़े टूट जाते हैं
और निहाई सुरक्षित बनी रहती है।

सहनशीलता जिसमें नहीं है, वह शीघ्र टूट जाता है।
और,
जिसने सहनशीलता के कवच को ओढ़ लिया है,
जीवन में प्रतिक्षण पड़ती चोटें उसे और मजबूत कर जाती हैं।

!! ओशो !!

जो है- है ❤

सुबह आती है, तो मैं सुबह को स्वीकार कर लेता हूं
और सांझ आती है,
तो सांझ को स्वीकार कर लेता हूं।
प्रकाश का भी आनंद है और अंधकार का भी।
जब से यह जाना, तब से दुख नहीं जाना है।

किसी आश्रम से एक साधु बाहर गया था।
लौटा तो उसे ज्ञात हुआ
कि उसका एक मात्र पुत्र मर गया है
और उसकी शवयात्रा अभी राह में ही होगी।

वह दुख में पागल हो गया।
उसे खबर क्यों नहीं की गई? वह आवेश में अंधा दौड़ा हुआ
श्मशान की और चला गया। शव मार्ग में ही था।

उसके गुरु शव के पास ही चल रहे थे।
उसने दौड़कर उन्हें पकड़ लिया।
दुख में वह मू‌िर्च्छत-सा हो गया था।
फिर अपने गुरु से उसने प्रार्थना की,
”दो शब्द सांत्वना के कहें।
मैं पागल हुआ जा रहा हूं।”

गुरु ने कहा,
”शब्द क्यों, सत्य ही जानो। उससे बड़ी कोई सांत्वना नहीं।”

और,
उन्होंने शव-पेटिका के ढक्कन को खोला
और उससे कहा, ”देखो- ‘जो है’, उसे देखो।”
उसने देखा। उसके आंसू थम गए।
सामने मृत देह थी। वह देखता रहा
और एक अंतदर्ृष्टिं का उसके भीतर जन्म हो गया।

जो है- है, उसमें रोना-हंसना क्या?

जीवन एक सत्य है, तो मृत्यु भी एक सत्य है।
जो है- है।
उससे अन्यथा चाहने से ही दुख पैदा होता है।

एक समय मैं बहुत बीमार था।
चिकित्सक भयभीत थे और प्रियजनों की आंखों में
विषाद छा गया था।
और, मुझे बहुत हंसी आ रही थी,
मैं मृत्यु को जानने को उत्सुक था।
मृत्यु तो नहीं आई,
लेकिन एक सत्य अनुभव में आ गया।
जिसे भी हम स्वीकार कर लें,
वही हमें पीड़ा पहुंचाने में
असमर्थ हो जाता है।

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!! ओशो !!

परिवार-विवाह- प्रेम

परिवार :
ओशो कहते हैं कि एक-एक परिवार में कलह है।
जिसको हम गृहस्थी कहते हैं,
वह संघर्ष, कलह, द्वेष, ईर्ष्या और चौबीसों घंटे उपद्रव का अड्डा बनी हुई है।
लेकिन न मालूम हम कैसे अंधे हैं कि देखने की कोशिश भी नहीं करते।
बाहर जब हम निकलते हैं तो मुस्कराते हुए निकलते हैं।
घर के सब आंसू पोंछकर बाहर जाते है- पत्नी भी हंसती हुई मालूम पड़ती है।
पति भी हंसता हुआ मालूम पड़ता है।
ये चेहरे झूठे हैं।
ये दूसरों को दिखाई पड़ने वाले चेहरे हैं।
घर के भीतर के चेहरे बहुत आंसुओं से भरे हुए है।
चौबीस घंटे कलह और संघर्ष में जीवन बीत रहा है।
फिर इस कलह और संघर्ष के परिणाम भी होंगे ही।

विवाह :
हमने सारे परिवार को विवाह के केंद्र पर खड़ा कर दिया है,
प्रेम के केंद्र पर नहीं।
हमने यह मान रखा है कि विवाह कर देने से दो व्यक्ति प्रेम की दुनिया में उतर जाएंगे।
अद्भुत झूठी बात है,
और पांच हजार वर्षों में भी हमको इसका ख्याल नहीं आ सका है।
हम अद्भुत अंधे हैं।
दो आदमियों के हाथ बांध देने से प्रेम के पैदा हो जाने की कोई जरूरत नहीं है।
कोई अनिवार्यता नहीं है बल्कि सच्चाई यह है कि जो लोग बंधा हुआ अनुभव करते हैं, वे आपस में प्रेम कभी नहीं कर सकते।

प्रेम:
प्रेम का जन्म होता है स्वतंत्रता में।
प्रेम का जन्म होता है स्वतंत्रता की भूमि में- जहां कोई बंधन नहीं, कोई मजबूरी नहीं है।
किंतु हम अविवाहित स्त्री या पुरुष के मन में युवक ओर युवती के मन में उस प्रेम की पहली किरण का गला घोंटकर हत्या कर देते हैं।
फिर हम कहते हैं कि विवाह से प्रेम पैदा होना चाहिए।

Astrology-Love-Marriage

ओशो विचार क्रांति

पुरुष की उत्सुकता

पुरुष की उत्सुकता किसी भी स्त्री में तभी तक
होती है, जब तक वह उसे जीत नहीं लेता। जीतते
ही उसकी उत्सुकता समाप्त हो जाती है।
जीतते ही फिर कोई रस नहीं रह जाता।
नीत्शे ने कहा है कि पुरुष का गहरे से गहरा रस
विजय है।
कामवासना भी उतनी गहरी नहीं है।
कामवासना भी विजय का एक क्षेत्र है।
इसलिए पत्नी में उत्सुकता समाप्त हो जाती है,
क्योंकि वह जीती ही जा चुकी। उसमें कोई अब
जीतने को बाकी नहीं रहा है।
इसलिए जो बुद्धिमान पत्नियां हैं, वे सदा इस
भांति जीएंगी पति के साथ कि जीतने को कुछ
बाकी बना रहे। नहीं तो पुरुष का कोई रस
सीधे स्त्री में नहीं है। अगर कुछ अभी जीतने को
बाकी है तो उसका रस होगा। अगर सब जीता
जा चुका है तो उसका रस खो जाएगा। तब कभी-
कभी ऐसा भी घटित होता है कि अपनी सुंदर
पत्नी को छोड़ कर वह एक साधारण स्त्री में
भी उत्सुक हो सकता है। और तब लोगों को बड़ी
हैरानी होती है कि यह उत्सुकता पागलपन की
है। इतनी सुंदर उसकी पत्नी है और वह
नौकरानी के पीछे दीवाना हो! पर आप समझ
नहीं पा रहे हैं। नौकरानी अभी जीती जा
सकती है; पत्नी जीती जा चुकी। सुंदर और
असुंदर बहुत मौलिक नहीं हैं। जितनी कठिनाई
होगी जीत में, उतना पुरुष का रस गहन होगा।
और स्त्री की स्थिति बिलकुल और है। जितना
पुरुष मिला हुआ हो, जितना उसे अपना मालूम
पड़े, जितनी दूरी कम हो गई हो, उतनी ही वह
ज्यादा लीन हो सकेगी। स्त्री इसलिए पत्नी
होने में उत्सुक होती है; प्रेयसी होने में उत्सुक
नहीं होती। पुरुष प्रेमी होने में उत्सुक होता
है; पति होना उसकी मजबूरी है।
स्त्री का यह जो संतुलित भाव है–विजय की
आकांक्षा नहीं है–यह ज्यादा मौलिक स्थिति
है। क्योंकि असंतुलन हमेशा संतुलन के बाद की
स्थिति है। संतुलन प्रकृति का स्वभाव है।
इसलिए हमने पुरुष को पुरुष कहा है और स्त्री
को प्रकृति कहा है। प्रकृति का मतलब है कि
जैसी स्थिति होनी चाहिए स्वभावतः।

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~~~ओशो

प्रेम सम्बन्ध

निरंतर व्यक्ति जीवन भर तलाश में रहेगा – अन्वेषण करेगा , खोजेगा — स्त्री के शरीर को : और स्त्री खोजती रहेगी पुरुष के शरीर को |

विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होता है , क्योंकि शरीरो की ध्रुवताये मदद देती है ; वे उर्जा देती है | तुम बढ़ते हो उसके द्वारा ; तुम शक्तिशाली बनते हो उसके द्वारा |

यह स्वाभाविक है , इसमें कुछ गलत नहीं है | लेकिन जब कोई शुद्ध हो जाता है — अहिंसा अपरिग्रह , सत्य के द्वारा जब कोई शुद्ध हो जाता है– तो जितना कोई व्यक्ति शुद्ध हो जाता है , उतना ही चेतना का फोकस शरीर से आत्मा की और मुड जाता है | आत्मा नितांत अकेली हो सकती है |

इसलिए जो व्यक्ति बहुत ज्यादा जुडा होता है शरीर से , वह कभी मुक्त नहीं हो सकता | वह जुड़ाव ही उसे बहुत तरह के बन्धनों में कारागृहो में ले जाएगा |

तुम किसी स्त्री को प्रेम करते हो , तुम किसी पुरुष को प्रेम करते हो , लेकिन गहरे में तुम प्रतिरोध भी करते हो — क्योंकि प्रेमी भी एक बंधन होता है |

प्रेम सम्बन्ध तुम्हे पंगु कर देता है | वह तुम्हे तृप्त भी करता है , पंगु भी करता है | तुम उसके बिना भी नहीं रह सकते और तुम उसके साथ भी नहीं रह सकते

यही सारे प्रेमिओ की समस्या है | वे अलग भी नहीं रह सकते और साथ भी नहीं रह सकते

12360341_10205511791460104_4900725559386473589_n|~~~~ओशो ~~~~

दिव्या प्रेम

एक स्त्री और एक पुरूष लडते- लडते जिदंगी गुजार देते है. नब्बे प्रतिशत जीवन उनका इसी कलह में बीतता हैं. और परिणाम क्या क्या हाथ लगता है. कभी मुश्किल से भी कोई जोड़ा दिखाई पड़ता है जो इस मूढता से बचता हो. बहुत मुश्किल से. मैं हजारों घरों में ठहरा रहा हूं, हजारो परिवारों का मुझे अनुभव है. कभी हजार में एकाद जोडा ऐसा दिखाई पडता है, जिसमें प्रेम है; नही तो बस कलह, संघर्ष है, उपद्रव है.

प्रेम उठ ही तब सकता है जब ध्यान गहरा हो. नही तो जिसे तुम प्रेम कहते हो वह सिवाय कामवासना के कुछ नहीं. वह बस एक जैविक जबरदस्ती है. तुम्हारे भीतर प्रकृति का दबाव है.; तुम्हारी मालकियत नहीं है. वह कोई प्रेम है ? सिर्फ वासना की पुर्ति है प्रेम कैसे हो सकता है ? जहां वासना की पुर्ति है वहां कलह होगी ही, क्योंकि जिससे वासना की पुर्ति करते हैं उस पर हम निर्भर हो जाते हैं.

और दुनिया में कोई भी किसी पर निर्भर नहीं होना चाहता. जिस पर हम निर्भर होते है, उसे हम कभी क्षमा नहीं कर पाते. क्योकि जिस पर हम निर्भर होते है उसके हम गुलाम हो गए. पति पत्नि से बदलाक्ष लेता है इस गुलामी का. पत्नि पति से बदला लेती है इस गुलामी का. जहां वासना होगी वहां बदला होगा. और जहां वासना है वहां पश्चात्ताप भी होगा, क्योकि वासना हीन तल की बात है. जीवन का सबसे निम्मतम जो तल है वही वासना का है.

मैं पहले ध्यान सिखाता हूं, फिर ध्यान का पिछे आना चाहीए प्रेम. आता है, निश्चित आता है.

और तब एक और लोक का प्रेम आता है, एक और जगत का प्रेम आता है. एक ऐसा प्रेम आता है, जो परमात्मा के गंध जैसा है. उस प्रेम न पीडा है , न दंश है, न कांटे है, न जहर है. उस प्रेम मे कोई राजनिति नही है, ईर्ष्या नहीं, जलन नहीं. उस प्रेम कोई पछतावा नहीं, दुसरें दावेदारी और मालकियत नहीं है.vijay

प्रेम परिभाषा में बंधता नहीं

मस्तिष्क का काम है रहस्य को रहस्य न रहने दे, उसे सुस्पष्ट परिभाषा में बांध ले। मगर कुछ चीजें हैं जो परिभाषा में बंधती नहीं। प्रेम परिभाषा में बंधता नहीं। लाख करो उपाय, परिभाषा छोटी पड़ जाती है। व्याख्या में समाता नहीं। बड़े बड़े हार गए, सदियां बीत गईं, प्रेम के संबंध में कितनी बातें कही गईं और प्रेम के संबंध में एक भी बात कही नहीं जा सकी है। जो कहा गया, सब ओछा पड़ा। जो कहा गया, सब थोथा सिद्ध हुआ। प्रेम इतना बड़ा है, इतना विराट है कि यह आकाश भी छोटा है।

प्रेम के आकाश से यह आकाश छोटा है। ऐसे कितने ही आकाश उसमें समा जाएं। महावीर ने इस आकाश को अनंत कहा है, और आत्मा के आकाश को अनंतानंत। अगर अनंत को अनंत से गुणा कर दें। असंभव बात। क्योंकि अनंत का अर्थ ही हो गया कि उसकी कोई सीमा नहीं, अब उसका गुणा कैसे करोगे? कोई आंकड़ा नहीं। लेकिन महावीर ने कहा, अगर यह हो सके कि अनंत को हम अनंत से गुणा कर सकें, तो अनंतानंत, तो हमारे भीतर के आकाश की थोड़ीसी रूपरेखा स्पष्ट होगी।

लेकिन मन हर चीज को समझ कर, जान कर स्पष्ट कर लेना चाहता है। क्यों? मस्तिष्क की यह आकांक्षा क्यों है? यह इसलिए कि जो स्पष्ट हो जाता है, मस्तिष्क उसका मालिक हो जाता है। जो राज राज नहीं रह जाते, मस्तिष्क उनका उपयोग करने लगता है साधन की तरह। लेकिन कुछ राज हैं जो राज ही हैं और राज ही रहेंगे। मस्तिष्क उन पर कभी मालकियत नहीं कर सकता और उनका कभी साधन की तरह उपयोग नहीं हो सकता। वे परम साध्य हैं। सभी साधन उनके लिए हैं। प्रेम जिस तरफ इशारा करता है, वह इशारा परमात्मा की तरफ है। प्रेम का तीर जिस तरफ चलता है, वह परमात्मा है।

प्रेम का लक्ष्य सदा परमात्मा है। इसलिए तुम जिससे भी प्रेम करो उसमें तुम्हें परमात्मा की झलक अनुभूत होने लगेगी। इसीलिए तो प्रेमियों को लोग पागल कहते हैं। मजनू को लोग पागल कहते हैं; क्योंकि उसे लैला परमात्मा मालूम होती है। शीरीं को लोग पागल कहते हैं, क्योंकि फरहाद उसे परमात्मा मालूम होता है। पागल न कहें तो क्या कहें?? एक साधारणसी स्त्री, एक साधारणसा पुरुष परमात्मा कैसे? लेकिन उन्हें प्रेम के रहस्य का कुछ अनुभव नहीं है। प्रेम की जहां भी छाया पड़ती है, वहीं परमात्मा का आविष्कार हो जाता है। प्रेम भरी आंख से फूल को देखोगे तो फूल परमात्मा है। और प्रेम भरी आंख से कांटे को देखोगे तो कांटा भी परमात्मा है। प्रेम की आंख जहां पड़ी, वहीं परमात्मा उघड़ आता है।

सपना यह संसार

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स्त्री जब तक चरित्रहीन नहीं हो सकती जब तक पुरुष चरित्रहीन न हो

संन्यास लेने के बाद गौतम बुद्ध ने अनेक क्षेत्रों की यात्रा की। एक बार वह
एक गांव में गए। वहां एक स्त्री उनके पास आई और बोली- आप तो कोई
राजकुमार लगते हैं। क्या मैं जान सकती हूं कि इस युवावस्था में गेरुआ
वस्त्र पहनने का क्या कारण है?
बुद्ध ने विनम्रतापूर्वक उत्तर
दिया कि तीन प्रश्नों के हल ढूंढने के लिए उन्होंने संन्यास लिया। यह शरीर
जो युवा व आकर्षक है, पर जल्दी ही यह वृद्ध होगा, फिर बीमार व अंत में मृत्यु के
मुंह में चला जाएगा। मुझे वृद्धावस्था, बीमारी व मृत्यु के कारण का ज्ञान
प्राप्त करना है । उनसे प्रभावित होकर उस स्त्री ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। शीघ्र ही यह बात पूरे गांव में फैल गई। गांव वासी बुद्ध के पास आए व आग्रह किया कि वे इस स्त्री के घर भोजन करने न जाएं क्योंकि वह चरित्रहीन है।
बुद्ध ने गांव के मुखिया से पूछा- क्या आप भी मानते हैं कि वह स्त्री चरित्रहीन है ?
मुखिया ने कहा कि मैं शपथ लेकर कहता हूं कि वह बुरे चरित्र वाली है। आप उसके घर न जाएं।
बुद्ध ने मुखिया का दायां हाथ पकड़ा और उसे ताली बजाने को कहा।
मुखिया ने कहा- मैं एक हाथ से ताली नहीं बजा सकता क्योंकि मेरा दूसरा हाथ
आपने पकड़ा हुआ है। बुद्ध बोले- इसी प्रकार यह स्वयं
चरित्रहीन कैसे हो सकती है जब तक इस
गांव के पुरुष चरित्रहीन न हों। अगर गांव के सभी पुरुष अच्छे होते तो यह औरत
ऐसी न होती इसलिए इसके चरित्र के लिए यहां के पुरुष जिम्मेदार हैं। यह सुनकर सभी
लज्जित हो गए

 

 

जिस बात का लेना-देना दूसरों से है, उसके बारे में मत सोचें

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दूसरे की किसी बात को लेकर सोचें मत। “और तुम यही
सोचते रहते हो। निन्यानबे प्रतिशत बातें जो तुम
सोचते हो उनका लेना-देना दूसरों से रहता है। छोड़ दें,
उन्हें इसी वक्त छोड़ दें! “तुम्हारा जीवन बहुत छोटा है,
और जीवन हाथों से फिसला जा रहा है। हर घड़ी तुम
कम हो रहे हो, हर दिन तुम कम हो रहे हो, और हर दिन
तुम कम जीवित होते जाते हो! हर जन्म-दिन तुम्हारा
मरण-दिन है; तुम्हारे हाथों से एक वर्ष और फिसल
गया। कुछ और प्रज्ञावान बनो।
“जिस बात का लेना-देना दूसरों से है, उसके बारे में मत
सोचें। पहले अपनी मुख्य दुर्बलता के विपरीत अभ्यास
करें।
“गुरजिएफ अपने अनुयायियों से कहा करता था–
‘पहली बात, सबसे पहली बात, ढूंढें कि तुम्हारी मूल
दुर्बलता क्या है, तुम्हारा मुख्य अकर्म, तुम्हारे अवचेतन
की केंद्रीय संकीर्णता क्या है। ‘हर व्यक्ति अलग है।
कोई व्यक्ति काम से ग्रसित है। भारत जैसे देश में, जहां
काम को सदियों दबाया जाता रहा है, यह लगभग
वहां एक मनोग्रस्ति बन गया है; हर व्यक्ति काम से
ग्रसित है। कोई क्रोध से ग्रसित है, और कोई लोभ से
ग्रसित है। तुम्हें देखना होगा कि तुम्हारी मूल
मनोग्रस्ति क्या है। “अत: सबसे पहले अपनी मूल
मनोग्रस्ति को जानें जिसके ऊपर तुम्हारे पूरे अहंकार
का भवन खड़ा है। और फिर निरंतर सचेत रहें क्योंकि यह
केवल तभी रह सकती है अगर तुम अचेत हो। बोध की
अग्नि में जल कर यह स्वयं ही भस्म हो जाती है। “और
स्मरण रहे, सदा स्मरण रहे कि तुम्हें इसके विपरीत को
पोषित नहीं करना है। नहीं तो होता यह है कि
व्यक्ति को यह बोध होने लगता है कि ‘मैं क्रोध में
ग्रसित हो जाता हूं तो मुझे करुणा को पोषित करना
चाहिए।’ ‘मैं काम मे आविष्ट हो जाता हूं, मुझे क्या
करना चाहिए? मुझे ब्रह्मचर्य का अभ्यास करना
चाहिए।’ “लोग एक अति से दूसरी अति पर जाने लगते
हैं। यह अतिक्रमण का ढंग नहीं है। यह वही पेंडुलम है,
बाएं से दाएं जाता हुआ और दाएं से बाएं। ठीक इसी
तरह तुम्हारा जीवन सदियों से चल रहा है; यह वही
पेंड़ुलम है। “पेंडुलम मध्य में रोकना होगा। और यही बोध
का करिश्मा है। बस यह बोध रखें, ‘यही मेरी मुख्य
खाई है, यही वह स्थान है जहां मैं बार-बार टकराता
हूं, यही मेरी बेहोशी की जड़ है।’ “दूसरी अति को
पोषित न करें, बस, अपनी पूरी चेतना वहीं उड़ेल दें। अपने
समस्त बोध की होलिका बनाएं, और बेहोशी उसमें जल
कर भस्म हो जाएगी। और तब पेंडुलम बीच में रुक
जाएगा। “और पेंडुलम के रुकने से समय रुक जाता है। तुम
समयातीत, सनातन व शाश्वत में प्रवेश कर जाते हो।

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