प्रेम का पाने से क्या संबंध है?

प्रश्न – मैंने कभी किसी को प्रेम किया था, लेकिन उसे पाने में असफल रहा। क्या कभी मेरा उससे मिलन होगा?

प्रेम का पाने से क्या संबंध है? मोह का पाने से संबंध है। मोह न पाए तो तड़फता है। प्रेम तो कर लिया और भर गया; पाने की क्या बात है? तुम प्रेम और मोह में भेद नहीं समझ पा रहे हो। तुमने मोह को प्रेम समझा है।

प्रेम कभी असफल नहीं होता–हो ही नहीं सकता। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रेम तुम करोगे तो वह तुम्हें मिल ही जाएगा। उसको मैं सफलता नहीं कहता। प्रेम के तो करने में ही सफलता है।लेकिन तुम चाहते होओगे कि यह स्त्री मेरी पत्नी बने। तुम सोचते हो यह प्रेम है? तुम कब्जा करना चाहते थे। तुम इस स्त्री को मेरी ही हो, और किसी की न हो, इस तरह की सील-मोहर लगाना चाहते थे। तुम स्वामी बनना चाहते थे। तुम इस स्त्री को संपत्ति बनाना चाहते थे।

अक्सर ऐसा हो जाता है कि जिसको तुम पाना चाहते थे और नहीं पा सके, तो तुम्हारा अहंकार तड़फता रहता है, क्योंकि तुम्हें चोट लगी, तुम नहीं पा सके। तुम हार गए। तुम अपनी विजय करके दिखाना चाहते थे और विजय नहीं हो पाई। वह घाव तुम में तड़फता है। यह अहंकार ही है, यह प्रेम नहीं है !

love

|| ओशो ||

प्रेम और दुख

15871846_364831000561092_182927678251407909_n

आप एक स्त्री के प्रेम में पड़ गये हैं,
एक पुरुष के प्रेम में पड़ गये हैं।
आपने कभी खयाल नहीं किया होगा
कि सभी प्रेम इतनी

कठिनाइयों में क्यों ले जाते हैं,
और सभी प्रेम अंततः
दुख क्यों बन जाते हैं।

उसका कारण है।
किसी का चेहरा आपको सुंदर लगा,
यह आंख का रस है।

अगर आंख बहुत प्रभावी सिद्ध हो
जाये तो आप प्रेम में पड़ जायेंगे।

लेकिन कल उसकी गंध शरीर की
आपको अच्छी नहीं लगती,

तब नाक इनकार करने लगेगी।
आप उसके शरीर को छूते है,
लेकिन उसके शरीर की ऊष्मा
आपके हाथ को अच्छी नहीं लगती,
तो हाथ इनकार करने लगेंगे।

आपकी सारी इंद्रियों के बीच
कोई ताल—मेल नहीं है,
इसलिए प्रेम विसंवाद हो जाता है।
एक इंद्रिय के आधार पर
आदमी चुन लेता है,

बाकी इंद्रियां धीरे— धीरे
अपना—अपना स्वर देना
शुरू करेंगी और तब एक ही
व्यक्ति के प्रति कोई इंद्रिय
अच्छा अनुभव करती है,
दूसरी इंद्रिय बुरा अनुभव करती है।
आपके मन में हजार विचार एक
ही व्यक्ति के प्रति हो जाते हैं।

और हममें से अधिक लोग
आंख का इशारा मान
कर चलते हैं।

क्योंकि आंख बडी प्रभावी हो गयी है।

हमारे चुनाव में,
नब्बे प्रतिशत आंख काम करती है।
हम आंख की मान लेते हैं,
दूसरी इंद्रियों की हम कोई फिक्र नहीं करते।
आज नहीं कल कठिनाई शुरू हो जाती है।
क्योंकि दूसरी इंद्रियां भी
असर्ट करना शुरू करती है,
अपने वक्तव्य देना शुरू करती हैं।

आंख की गुलामी मानने
को कान राजी नहीं है।
इसलिए आंख ने कितना ही
कहां हो कि चेहरा सुंदर है,
इस कारण वाणी को कान
मान लेगा कि सुंदर है,
यह आवश्यक नहीं है।
आंख की आवाज को,
आंख की मालकियत को,
नाक मानने को राजी नहीं है।
आंख ने कहां हो कि शरीर सुंदर है,
लेकिन नाक तो कहेगी कि
शरीर से जो गंध आती है,
अप्रीतिकर है।

फिर क्या होगा?
एक ही व्यक्ति के प्रति पांचों
इंद्रियों के अलग—अलग वक्तव्य
जटिलता पैदा कर देते हैं।
यह जो जटिलता है,
केवल उसी व्यक्ति में नहीं होती,
जिसका भीतर मालिक जगा होता है।

तो फिर पांचों इंद्रियों को
जोडने वाला एक केंद्र भी होता है।
हमारे भीतर कोई केंद्र नहीं है।
हमारी हर इंद्रिय मालकियत जाहिर करती है।
और हर इंद्रिय का वक्तव्य आखिरी है।
कोई दूसरी इंद्रिय उसके
वक्तव्य को काट नहीं सकती।
हम सभी इंद्रियों के वक्तव्य
इकट्ठे करके एक विसंगतियों
का ढेर हो जाते हैं।

हमारे भीतर—जिसे हम प्रेम करते है—
उसके प्रति घृणा भी होती है।
क्योंकि एक इंद्रिय प्रेम करती है,
एक घृणा करती है।
और हम इसमें कभी
ताल—मेल नहीं बिठा पाते।
तो ज्यादा से ज्यादा हम यही करते है
कि हम हर इंद्रिय को रोटेशन
में मौका देते रहते है।
हमारी इंद्रियां रोटरी क्लब के सदस्य है।

कभी आंख को मौका देते है
तो वह मालकियत कर लेती है,
तब। कभी कान को मौका देते है,
तब वह मालकियत कर लेता है।
लेकिन इनके बीच कभी कोई
ताल—मेल निर्मित नहीं हो पाता।

कोई संगति, कोई सामंजस्य,
कोई संगीत पैदा नहीं हो पाता।
इसलिए जीवन हमारा एक दुख हो जाता है।