प्रेम || जिसके सामने मृत्यु समर्पण करती है

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प्रेम एकमात्र तत्व है,
जिससे मृत्यु हारती है;
जिसके सामने मृत्यु समर्पण करती है।
इसे समझना।
इसीलिये जिसका हृदय प्रेम से भरा है
उसके जीवन में भय विसर्जित हो जाता है।
क्योंकि सभी भय मृत्यु का भय है।
और जिसके जीवन में भय है
उसके जीवन में प्रेम का अंकुरण नहीं हो पाता।
भयभीत व्यक्ति धन इकट्ठा करेगा,
पद-प्रतिष्ठा की खोज करेगा;
लेकिन प्रेम से बचेगा।
प्रेमी सब लुटा देगा प्रेम के ऊपर,
सब निछावर कर देगा–पद भी,
प्रतिष्ठा भी, धन भी,
जरूरत पड़े तो जीवन भी।
सिर्फ प्रेम ही जानता है,
जीवन का समर्पण भी किया जा सकता है ।
क्योंकि प्रेम को पता है कि
जीवन के बाद भी एक और जीवन है;
कि जीवन को छोड़कर भी शाश्वत
जीवन शेष ही रह जाता है।

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अपेक्षा

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दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करना बंद करो, क्योंकि यह एक मात्र ढंग है जिससे तुमआत्महत्या कर सकते हो। तुम यहां किसी की भी अपेक्षाएं पूरी करने के लिए नहीं हो और कोई भी यहां तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करने के लिए नहीं हैं। दूसरों की अपेक्षाओं के कभी भी शिकार मत बनो और किसी दूसरे को अपनी अपेक्षाओं का शिकार मत बनाओ।यही है जिसे मैं निजता कहता हूं। अपनी निजता का सम्मान करो और दूसरों की निजता का भी सम्मान करो। कभी भी किसी के जीवन में हस्तक्षेप मत करो और किसी को भी अपनेजीवन में हस्तक्षेप मत करने दो। सिर्फ तब ही एक दिन तुम आध्यात्मिकता में विकसितहो सकते हो।वर्ना, नन्यानबे प्रतिशत लोग आत्महत्या करते हैं। उनका सारा जीवन और कुछ नहीं बस धीमी गति से आत्महत्या है। यह अपेक्षा और वह अपेक्षा पूरी करते हुए…किसी दिन पिता, किसी दिन माता, किसी दिन पत्नी, पति, फिर बच्चे आते हैं–वे अपेक्षाएं करते हैं। फिर समाज आ जाता है, पंडित और राजनेता। चारों तरफ सभी अपेक्षाएं कर रहेहैं। और तुम बेचारे वहां हो, बस बेचारे मनुष्य–और सारी दुनिया तुमसे अपेक्षा कर रही है कि यह करो और वह करो। और तुम दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते, क्योंकि वे बड़ी विरोधाभासी हैं।तुम दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करते हुए पागल हो गए हो। और तुमने किसी की भी अपेक्षा पूरी नहीं की है। कोई भी प्रसन्न नहीं है। तुम हार गए, नष्ट हो गए और कोईभी प्रसन्न नहीं है। जो लोग स्वयं के साथ खुश नहीं हैं वे प्रसन्न नहीं हो सकते।तुम कुछ भी कर लो, वे तुम्हारे साथ अप्रसन्न होने के मार्ग ढूंढ़ लेंगे, क्योंकि वे प्रसन्न नहीं हो सकते।प्रसन्नता एक कला है जो तुम्हें सीखनी होती है। इसका तुम्हारे करने या न करने सेकुछ लेना देना नहीं है।सुखी करने की जगह, प्रसन्न होने की कला सीखो।