The woman

Untitled

The woman is the earth.

You are rooted in woman.

You come out of the womb.

You come out of it –
and, in one way,
one never comes out of it.

Something remains rooted.
Hence so much attraction to women.

In fact the sexual penetration
is nothing but a search
again for the womb.

Now you cannot go
into the womb totally
so you penetrate sexually.

It is a search for the womb,
a search for the roots.

ध्यान-विधि

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यह बड़ी प्यारी विधि है। तुम इसे वैसे ही शुरु कर सकते हो जैसे तुम हो — पहले कोई शर्त पूरी नहीं करनी है।

बहुत सरल विधि है। तुम व्यक्तियों से, वस्तुओं से, घटनाओं से घिरे हो। हर क्षण तुम्हारे चारों ओर कुछ न कुछ है; वस्तुएं हैं, घटनाएं हैं, व्यक्ति हैं — लेकिन क्योंकि तुम सचेत नहीं हो, इसलिये तुम भर नहीं हो। सब कुछ मौजूद है, लेकिन तुम गहरी नींद में सोये हो।

तो तुम्हारे आसपास जो कुछ भी होता है, वही मालिक बन जाता है, तुम्हारे ऊपर हावी हो जाता है और तुम उसके द्वारा खींच लिये जाते हो। तुम उससे प्रभावित ही नहीं होते, संस्कारित भी हो जाते हो। तुम बलशाली नहीं हो, बाकी सब कुछ तुमसे ज्यादा बलशाली है। तुम्हारी भावदशा, तुम्हारा मन, सब दूसरी चीजों पर निर्भर है — विषय तुम्हें प्रभावित कर देते हैं!

चेतना की ऐसी अवस्था पर आना है, जहाँ कुछ भी तुम्हें प्रभावित न करे और तुम निर्लिप्त बने रह सको। यह कैसे हो?

दिन भर इसके लिये अवसर है। किसी भी क्षण तुम सजग हो सकते हो जब तुम्हें कुछ आविष्ट कर रहा है। तब एक गहरी श्वास लो, गहरी श्वास भीतर खींचो, गहरी श्वास बाहर छोड़ो, और उस चीज को फिर से देखो — लेकिन देखो एक साक्षी की तरह, एक द्रष्टा की तरह।

जब भी तुम्हें लगे कि कोई चीज तुम्हें प्रभावित कर रही है, तुम पर हावी हो रही है, तुम्हें तुमसे दूर ले जा रही है, तुमसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो रही है — तो गहरी श्वास लो और छोड़ो। और श्वास बाहर छोड़ने से पैदा हुए उस छोटे से अंतराल में उस चीज की ओर देखो — कोई सुंदर चेहरा, कोई सुंदर शरीर, कोई सुंदर मकान, या कुछ भी।

अगर तुम्हें यह कठिन लगे, अगर श्वास बाहर छोड़ने भर से ही तुम अंतराल पैदा न कर पाओ, तो एक काम और करो — श्वास बाहर छोड़ो, और एक क्षण को श्वास को भीतर लेना रोक लो, रुक जाओ, श्वास भीतर मत लो और उस चीज की ओर देखो।

जब पूरी वायु बाहर है, या भीतर है, जब तुमने श्वास लेना बंद कर दिया है तो कुछ भी तुम्हें प्रभावित नहीं कर सकता। उस क्षण में तुम सेतुहीन हो जाते हो — सेतु टूट जाता है। श्वास ही सेतु है!

इसे करके देखो।

केवल एक क्षण के लिये ऐसा होगा कि तुम साक्षी को अनुभव करोगे, लेकिन उससे तुम्हें स्वाद मिल जायेगा; उससे तुम्हें अनुभव हो जायेगा कि साक्षित्व क्या है। फिर तुम उसकी खोज में आगे बढ़ सकते हो!

~ ओशो
तंत्र-सूत्र

सहनशीलता

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एक व्यक्ति किसी लुहार के द्वार से गुजरता था।
उसने निहाई पर पड़ते
हथौड़े की चोटों को सुना और भीतर झांककर देखा।

उसने देखा कि एक कोने में
बहुत से हथौड़े टूटकर और विकृत होकर पड़े हुए हैं।
समय और उपयोग ने ही
उनकी ऐसी गति की होगी।

उस व्यक्ति ने लुहार से पूछा,
”इतने हथोड़ों को
इस दशा तक पहुंचाने के लिए कितनी निहाइयों की
आपको जरूरत पड़ी?”

लुहार हंसने लगा और बोला,
”केवल एक ही मित्र,
एक ही निहाई सैकड़ों हथौड़ों को तोड़ डालती है,
क्योंकि हथौड़े चोट करते हैं
और निहाई सहती है।”

यह सत्य है कि अंत में वही जीतता है,
जो चोटों को
धैर्य से स्वीकार करता है।
निहाई पर पड़ती हथौड़ों की चोटों की भांति ही
उसके जीवन में भी
चोटों की आवाज तो बहुत सुनी जाती है,
लेकिन अंतत:
हथौड़े टूट जाते हैं
और निहाई सुरक्षित बनी रहती है।

सहनशीलता जिसमें नहीं है, वह शीघ्र टूट जाता है।
और,
जिसने सहनशीलता के कवच को ओढ़ लिया है,
जीवन में प्रतिक्षण पड़ती चोटें उसे और मजबूत कर जाती हैं।

!! ओशो !!