जो है- है ❤

सुबह आती है, तो मैं सुबह को स्वीकार कर लेता हूं
और सांझ आती है,
तो सांझ को स्वीकार कर लेता हूं।
प्रकाश का भी आनंद है और अंधकार का भी।
जब से यह जाना, तब से दुख नहीं जाना है।

किसी आश्रम से एक साधु बाहर गया था।
लौटा तो उसे ज्ञात हुआ
कि उसका एक मात्र पुत्र मर गया है
और उसकी शवयात्रा अभी राह में ही होगी।

वह दुख में पागल हो गया।
उसे खबर क्यों नहीं की गई? वह आवेश में अंधा दौड़ा हुआ
श्मशान की और चला गया। शव मार्ग में ही था।

उसके गुरु शव के पास ही चल रहे थे।
उसने दौड़कर उन्हें पकड़ लिया।
दुख में वह मू‌िर्च्छत-सा हो गया था।
फिर अपने गुरु से उसने प्रार्थना की,
”दो शब्द सांत्वना के कहें।
मैं पागल हुआ जा रहा हूं।”

गुरु ने कहा,
”शब्द क्यों, सत्य ही जानो। उससे बड़ी कोई सांत्वना नहीं।”

और,
उन्होंने शव-पेटिका के ढक्कन को खोला
और उससे कहा, ”देखो- ‘जो है’, उसे देखो।”
उसने देखा। उसके आंसू थम गए।
सामने मृत देह थी। वह देखता रहा
और एक अंतदर्ृष्टिं का उसके भीतर जन्म हो गया।

जो है- है, उसमें रोना-हंसना क्या?

जीवन एक सत्य है, तो मृत्यु भी एक सत्य है।
जो है- है।
उससे अन्यथा चाहने से ही दुख पैदा होता है।

एक समय मैं बहुत बीमार था।
चिकित्सक भयभीत थे और प्रियजनों की आंखों में
विषाद छा गया था।
और, मुझे बहुत हंसी आ रही थी,
मैं मृत्यु को जानने को उत्सुक था।
मृत्यु तो नहीं आई,
लेकिन एक सत्य अनुभव में आ गया।
जिसे भी हम स्वीकार कर लें,
वही हमें पीड़ा पहुंचाने में
असमर्थ हो जाता है।

144336727-shift

!! ओशो !!

परिवार-विवाह- प्रेम

परिवार :
ओशो कहते हैं कि एक-एक परिवार में कलह है।
जिसको हम गृहस्थी कहते हैं,
वह संघर्ष, कलह, द्वेष, ईर्ष्या और चौबीसों घंटे उपद्रव का अड्डा बनी हुई है।
लेकिन न मालूम हम कैसे अंधे हैं कि देखने की कोशिश भी नहीं करते।
बाहर जब हम निकलते हैं तो मुस्कराते हुए निकलते हैं।
घर के सब आंसू पोंछकर बाहर जाते है- पत्नी भी हंसती हुई मालूम पड़ती है।
पति भी हंसता हुआ मालूम पड़ता है।
ये चेहरे झूठे हैं।
ये दूसरों को दिखाई पड़ने वाले चेहरे हैं।
घर के भीतर के चेहरे बहुत आंसुओं से भरे हुए है।
चौबीस घंटे कलह और संघर्ष में जीवन बीत रहा है।
फिर इस कलह और संघर्ष के परिणाम भी होंगे ही।

विवाह :
हमने सारे परिवार को विवाह के केंद्र पर खड़ा कर दिया है,
प्रेम के केंद्र पर नहीं।
हमने यह मान रखा है कि विवाह कर देने से दो व्यक्ति प्रेम की दुनिया में उतर जाएंगे।
अद्भुत झूठी बात है,
और पांच हजार वर्षों में भी हमको इसका ख्याल नहीं आ सका है।
हम अद्भुत अंधे हैं।
दो आदमियों के हाथ बांध देने से प्रेम के पैदा हो जाने की कोई जरूरत नहीं है।
कोई अनिवार्यता नहीं है बल्कि सच्चाई यह है कि जो लोग बंधा हुआ अनुभव करते हैं, वे आपस में प्रेम कभी नहीं कर सकते।

प्रेम:
प्रेम का जन्म होता है स्वतंत्रता में।
प्रेम का जन्म होता है स्वतंत्रता की भूमि में- जहां कोई बंधन नहीं, कोई मजबूरी नहीं है।
किंतु हम अविवाहित स्त्री या पुरुष के मन में युवक ओर युवती के मन में उस प्रेम की पहली किरण का गला घोंटकर हत्या कर देते हैं।
फिर हम कहते हैं कि विवाह से प्रेम पैदा होना चाहिए।

Astrology-Love-Marriage

ओशो विचार क्रांति

पुरुष की उत्सुकता

पुरुष की उत्सुकता किसी भी स्त्री में तभी तक
होती है, जब तक वह उसे जीत नहीं लेता। जीतते
ही उसकी उत्सुकता समाप्त हो जाती है।
जीतते ही फिर कोई रस नहीं रह जाता।
नीत्शे ने कहा है कि पुरुष का गहरे से गहरा रस
विजय है।
कामवासना भी उतनी गहरी नहीं है।
कामवासना भी विजय का एक क्षेत्र है।
इसलिए पत्नी में उत्सुकता समाप्त हो जाती है,
क्योंकि वह जीती ही जा चुकी। उसमें कोई अब
जीतने को बाकी नहीं रहा है।
इसलिए जो बुद्धिमान पत्नियां हैं, वे सदा इस
भांति जीएंगी पति के साथ कि जीतने को कुछ
बाकी बना रहे। नहीं तो पुरुष का कोई रस
सीधे स्त्री में नहीं है। अगर कुछ अभी जीतने को
बाकी है तो उसका रस होगा। अगर सब जीता
जा चुका है तो उसका रस खो जाएगा। तब कभी-
कभी ऐसा भी घटित होता है कि अपनी सुंदर
पत्नी को छोड़ कर वह एक साधारण स्त्री में
भी उत्सुक हो सकता है। और तब लोगों को बड़ी
हैरानी होती है कि यह उत्सुकता पागलपन की
है। इतनी सुंदर उसकी पत्नी है और वह
नौकरानी के पीछे दीवाना हो! पर आप समझ
नहीं पा रहे हैं। नौकरानी अभी जीती जा
सकती है; पत्नी जीती जा चुकी। सुंदर और
असुंदर बहुत मौलिक नहीं हैं। जितनी कठिनाई
होगी जीत में, उतना पुरुष का रस गहन होगा।
और स्त्री की स्थिति बिलकुल और है। जितना
पुरुष मिला हुआ हो, जितना उसे अपना मालूम
पड़े, जितनी दूरी कम हो गई हो, उतनी ही वह
ज्यादा लीन हो सकेगी। स्त्री इसलिए पत्नी
होने में उत्सुक होती है; प्रेयसी होने में उत्सुक
नहीं होती। पुरुष प्रेमी होने में उत्सुक होता
है; पति होना उसकी मजबूरी है।
स्त्री का यह जो संतुलित भाव है–विजय की
आकांक्षा नहीं है–यह ज्यादा मौलिक स्थिति
है। क्योंकि असंतुलन हमेशा संतुलन के बाद की
स्थिति है। संतुलन प्रकृति का स्वभाव है।
इसलिए हमने पुरुष को पुरुष कहा है और स्त्री
को प्रकृति कहा है। प्रकृति का मतलब है कि
जैसी स्थिति होनी चाहिए स्वभावतः।

12345586_642078235933749_7179326653219871913_n
~~~ओशो

प्रेम सम्बन्ध

निरंतर व्यक्ति जीवन भर तलाश में रहेगा – अन्वेषण करेगा , खोजेगा — स्त्री के शरीर को : और स्त्री खोजती रहेगी पुरुष के शरीर को |

विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होता है , क्योंकि शरीरो की ध्रुवताये मदद देती है ; वे उर्जा देती है | तुम बढ़ते हो उसके द्वारा ; तुम शक्तिशाली बनते हो उसके द्वारा |

यह स्वाभाविक है , इसमें कुछ गलत नहीं है | लेकिन जब कोई शुद्ध हो जाता है — अहिंसा अपरिग्रह , सत्य के द्वारा जब कोई शुद्ध हो जाता है– तो जितना कोई व्यक्ति शुद्ध हो जाता है , उतना ही चेतना का फोकस शरीर से आत्मा की और मुड जाता है | आत्मा नितांत अकेली हो सकती है |

इसलिए जो व्यक्ति बहुत ज्यादा जुडा होता है शरीर से , वह कभी मुक्त नहीं हो सकता | वह जुड़ाव ही उसे बहुत तरह के बन्धनों में कारागृहो में ले जाएगा |

तुम किसी स्त्री को प्रेम करते हो , तुम किसी पुरुष को प्रेम करते हो , लेकिन गहरे में तुम प्रतिरोध भी करते हो — क्योंकि प्रेमी भी एक बंधन होता है |

प्रेम सम्बन्ध तुम्हे पंगु कर देता है | वह तुम्हे तृप्त भी करता है , पंगु भी करता है | तुम उसके बिना भी नहीं रह सकते और तुम उसके साथ भी नहीं रह सकते

यही सारे प्रेमिओ की समस्या है | वे अलग भी नहीं रह सकते और साथ भी नहीं रह सकते

12360341_10205511791460104_4900725559386473589_n|~~~~ओशो ~~~~

दिव्या प्रेम

एक स्त्री और एक पुरूष लडते- लडते जिदंगी गुजार देते है. नब्बे प्रतिशत जीवन उनका इसी कलह में बीतता हैं. और परिणाम क्या क्या हाथ लगता है. कभी मुश्किल से भी कोई जोड़ा दिखाई पड़ता है जो इस मूढता से बचता हो. बहुत मुश्किल से. मैं हजारों घरों में ठहरा रहा हूं, हजारो परिवारों का मुझे अनुभव है. कभी हजार में एकाद जोडा ऐसा दिखाई पडता है, जिसमें प्रेम है; नही तो बस कलह, संघर्ष है, उपद्रव है.

प्रेम उठ ही तब सकता है जब ध्यान गहरा हो. नही तो जिसे तुम प्रेम कहते हो वह सिवाय कामवासना के कुछ नहीं. वह बस एक जैविक जबरदस्ती है. तुम्हारे भीतर प्रकृति का दबाव है.; तुम्हारी मालकियत नहीं है. वह कोई प्रेम है ? सिर्फ वासना की पुर्ति है प्रेम कैसे हो सकता है ? जहां वासना की पुर्ति है वहां कलह होगी ही, क्योंकि जिससे वासना की पुर्ति करते हैं उस पर हम निर्भर हो जाते हैं.

और दुनिया में कोई भी किसी पर निर्भर नहीं होना चाहता. जिस पर हम निर्भर होते है, उसे हम कभी क्षमा नहीं कर पाते. क्योकि जिस पर हम निर्भर होते है उसके हम गुलाम हो गए. पति पत्नि से बदलाक्ष लेता है इस गुलामी का. पत्नि पति से बदला लेती है इस गुलामी का. जहां वासना होगी वहां बदला होगा. और जहां वासना है वहां पश्चात्ताप भी होगा, क्योकि वासना हीन तल की बात है. जीवन का सबसे निम्मतम जो तल है वही वासना का है.

मैं पहले ध्यान सिखाता हूं, फिर ध्यान का पिछे आना चाहीए प्रेम. आता है, निश्चित आता है.

और तब एक और लोक का प्रेम आता है, एक और जगत का प्रेम आता है. एक ऐसा प्रेम आता है, जो परमात्मा के गंध जैसा है. उस प्रेम न पीडा है , न दंश है, न कांटे है, न जहर है. उस प्रेम मे कोई राजनिति नही है, ईर्ष्या नहीं, जलन नहीं. उस प्रेम कोई पछतावा नहीं, दुसरें दावेदारी और मालकियत नहीं है.vijay