इतना विषाद क्यों होता है प्रेम में?

तुम किसी स्त्री को प्रेम किए, किसी पुरुष को प्रेम किए। इतना विषाद क्यों होता है प्रेम में? प्रेमी बहुत शीघ्र ही विषाद से भर जाते हैं। विषाद कहा से आता है? प्रसन्न होना चाहिए था, तुम्हारी प्रेयसी तुम्हें मिल गयी। जानने वाले कहते है—मजनू धन्यभागी है कि उसको लैला नहीं मिली। मिल जाती तो विषादग्रस्त हो जाता। जिनको मिल गयी, उनसे पूछो। मिल जाने के बाद विषाद हो जाता है। जिस स्त्री को तुमने चाहा, मिल गयी, अब क्या करो? अब बैठे हैं पति—पत्नी होकर। अब कर रहे हैं एक—दूसरे का दर्शन और घबड़ा रहे हैं एक—दूसरे को, और घबड़ा रहे हैं एक—दूसरे से, और ऊब रहे हैं, अब करो क्या?
यह विषाद इसलिए पैदा होता है कि कोई उपाय नहीं इस स्त्री के साथ एक हो जाने का, इस पुरुष के साथ एक हो जाने का। कितने ही करीब आओ, दूरी रह जाती है, उस दूरी में विषाद है। मजनू को कम से कम एक तो आश्वासन रहा होगा कि कभी लैला मिलेगी, कभी मिलन होगा। उसे यह पता नहीं है कि मिलन होता ही नहीं। यह तो पता तभी चलेगा जब लैला मिल जाए और मिलन न हो, तब पता चलेगा, उसके पहले पता नहीं चलेगा। हाथ में हाथ लेकर खड़े रहो अपनी प्रेयसी का तो भी मिलन कहा है! तुम्हारा हाथ अलग, प्रेयसी का हाथ अलग। दोनों के बीच में बहुत कम दूरी है, मगर कम दूरी भी काफी दूरी है। गले से गला लगाकर खड़े हो जाओ, हृदय से हृदय लगाकर खड़े हो जाओ और दूरी है। संभोग के क्षण में भी एक क्षण को ऐसी भ्रांति होती है कि दूरी मिट गयी, मगर दूरी तो बनी ही रहती है।
इस जगत में प्रेम का विषाद यही है कि प्रेम चाहता है प्रेमी के साथ एक हो जाए और नहीं हो पाता। यह घटना भक्ति में ही घट सकती है। क्योंकि भक्ति में दो देहों का मिलन नहीं है, दो आत्माओं का मिलन है। आत्माएं एक—दूसरे में मिल सकती हैं।
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प्रेम : सफल जीवन का राज 

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एक दिन एक औरत
अपने घर के बाहर आई
और उसने तीन संतों को
अपने घर के सामने देखा।
वह उन्हें जानती नहीं थी।

औरत ने कहा
“कृपया भीतर आइये
और भोजन करिए।”

संत बोले-
“क्या तुम्हारे पति घर पर हैं?”

औरत ने कहा –
“नहीं, वे अभी बाहर गए हैं।”

संत बोले –
“हम तभी भीतर आयेंगे जब
वह घर पर हों।”

शाम को उस औरत का पति
घर आया और औरत ने उसे
यह सब बताया।

औरत के पति ने कहा –
“जाओ और उनसे कहो
कि मैं घर आ गया हूँ
और उनको आदर सहित बुलाओ।”

औरत बाहर गई
और उनको भीतर आने के लिए कहा।
संत बोले –
“हम सब किसी भी घर में
एक साथ नहीं जाते।”

“पर क्यों?” –
औरत ने पूछा।
उनमें से एक संत ने कहा
“मेरा नाम धन है”

फ़िर दूसरे संतों की ओर
इशारा कर के कहा
“इन दोनों के नाम सफलता
और प्रेम हैं।

हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है।
आप घर के अन्य सदस्यों से मिलकर
तय कर लें कि भीतर
किसे निमंत्रित करना है।”

औरत ने भीतर जाकर
अपने पति को यह सब बताया।

उसका पति बहुत
प्रसन्न हो गया और बोला –
“यदि ऐसा है तो हमें
धन को आमंत्रित करना चाहिए।

हमारा घर खुशियों से भर जाएगा।”

लेकिन उसकी पत्नी ने कहा –
“मुझे लगता है कि हमें
सफलता को आमंत्रित करना चाहिए।”

उनकी बेटी
दूसरे कमरे से यह सब सुन रही थी।
वह उनके पास आई और बोली
“मुझे लगता है कि हमें प्रेम
को आमंत्रित करना चाहिए।

प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं।”
“तुम ठीक कहती हो,
हमें प्रेम को ही बुलाना चाहिए”
उसके माता-पिता ने कहा।

औरत घर के बाहर गई
और उसने संतों से पूछा
“आप में से जिनका नाम प्रेम है
वे कृपया घर में प्रवेश कर
भोजन गृहण करें।”

प्रेम घर की ओर बढ़ चले।
बाकी के दो संत भी
उनके पीछे चलने लगे

औरत ने आश्चर्य से उन दोनों से पूछा
“मैंने तो सिर्फ प्रेम को आमंत्रित किया था।

आप लोग भीतर क्यों जा रहे हैं?”
उनमें से एक ने कहा
“यदि आपने धन और सफलता में से
किसी एक को आमंत्रित किया होता
तो केवल वही भीतर जाता।

आपने प्रेम को आमंत्रित किया है।
प्रेम कभी अकेला नहीं जाता।

प्रेम जहाँ- जहाँ जाता है,
धन और सफलता उसके पीछे जाते हैं।

इस कहानी को एक बार,
अच्छा लगे तो प्रेम के साथ रहें,
प्रेम बाटें,
प्रेम दें और प्रेम लें

क्यो
प्रेम ही सफल जीवन का राज है।

!! ओशो !!