विवाह

प्रश्न : मै ओशो के विचार विवाह के बारे मेँ पढ़ता रहा हुं फिर भी मुझे विवाह करना ही है, बस इतना उपाय देँ कि विवाह मेँ कष्ट कम से कम हो ।

ओशो : उपाय तो हर चीज का है। जहां बीमारी है वहां कोई न कोई ओषधि भी होगी ।
ढब्बूजी की तीन प्रेमिकाएँ थी ।फिर जब उन्होँने शादी की तो जो सबसे छोटे कद की थी ,
साढ़े तीन फीट की , उसे चुना ।
एक मित्र ने पुछा : इसका राज क्या है ? तुम्हारे पीछे तो दो -दो स्वस्थ सुंदर पढ़ी – लिखी और उंचे कद की लड़किया पड़ी थी ,
फिर इस दुबली – पतली मरियल सी ठिगनी लड़की को ही क्योँ पसंद किया ?
ढ़ब्बुजी ने कहा : राज वगैरह कुछ नहीँ है , सीधी – सच्ची बात हैँ । अरे भई , मुसीबत जितनी छोटी हो उतना ही अच्छा ।उतना ही शूभ , उतना ही सुदंर ।
अब तुम कह रहे हो कि कम से कम दुख हो । कोई रास्ता तो मिल सकता है ।
मुसीबत सोच – समझ कर चुनना । तुम्हारे हाथ मेँ है मुसीबत चुनना ।
मगर विवाह , जरुर करो । विवाह से बड़े अनुभव होँगे ।
और विवाह के बिना अनुभव के जीवन अधुरा रह जाता है । विवाह के बिना अनुभव के . . .
ऐसा स्वर्गीय सूख तुम्हेँ कैसे मिलेगा । पहले स्वर्गीय सुख लो । हालांकि सब स्वर्ग नरक सिद्ध होते है । मगर जब सब स्वर्ग नरक सिद्ध हो जाते है , तभी कोई व्यक्ति अपने भीतर प्रवेश करता है । पहले बाहर टटोलता है , खोजता है – दुसरो मेँ ।
वही तो विवाह है , और क्या ?
कोई विवाह धन से करता है , कोई पद से करता है , कोई स्त्री से , कोई पुरुष से , कोई महत्वकांक्षा से , कोई यश से ।
ये सब विवाह हैँ ।
पहले और मेँ खोजता है आदमी अपने सुख को ।
जब कहीँ भी नहीँ पाता , तब कहीँ अंतत : हार कर , थक कर अपने भीतर प्रवेश करता है |

Astrology-Love-Marriage

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दिखावा

सुंदर स्त्री आभूषणों से मुक्त हो जाती है;
कुरूप स्त्री कभी भी
आभूषणों से मुक्त नहीं हो सकती।
सुंदर स्त्री सरल हो जाती है;
कुरूप स्त्री कभी भी नहीं हो सकती।

क्योंकि उसे पता है,
आभूषण हट जाएं,
बहुमूल्य वस्त्र हट जाएं,
सोना-चांदी हट जाए,
तो उसकी कुरूपता ही प्रकट होगी।
वही शेष रह जाएगी,
और तो वहां कुछ बचेगा न।
सुंदर स्त्री को आभूषण शोभा देते ही नहीं,
वे थोड़ी सी खटक पैदा करते हैं
उसके सौंदर्य में।

क्योंकि कोई सोना कैसे
जीवंत सौंदर्य से महत्वपूर्ण हो सकता है?
हीरे-जवाहरातों में होगी चमक,
लेकिन जीवंत सुंदर आंखों से उनकी क्या,
क्या तुलना की जा सकती है?

जैसे ही कोई स्त्री सुंदर होती है,
आभूषण-वस्त्र का दिखावा कम हो जाता है।
तब एक्झिबीशन की वृत्ति कम हो जाती है।
असल में, सुंदर स्त्री का लक्षण ही यही है
कि जिसमें प्रदर्शन की कामना न हो।
जब तक प्रदर्शन की कामना है
तब तक उसे खुद ही पता है
कि कहीं कुछ असुंदर है,
जिसे ढांकना है, छिपाना है,
प्रकट नहीं करना है।
स्त्रियां घंटों व्यतीत करती हैं दर्पण के सामने।
क्या करती हैं दर्पण के सामने घंटों?
कुरूपता को छिपाने की चेष्टा चलती है;
सुंदर को दिखाने की चेष्टा चलती है।

ठीक यही जीवन के सभी संबंधों में सही है।
अज्ञानी अपने ज्ञान को दिखाना चाहता है।
वह मौके की तलाश में रहता है;
कि जहां कहीं मौका मिले,
जल्दी अपना ज्ञान बता दे।
ज्ञानी को कुछ अवसर की तलाश नहीं होती;
न बताने की कोई आकांक्षा होती।
जब स्थिति हो कि उसके ज्ञान की
कोई जरूरत पड़ जाए,
जब कोई प्यास से मर रहा हो
और उसको जल की जरूरत हो
तब वह दे देगा।
लेकिन प्रदर्शन का मोह चला जाएगा।

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अज्ञानी इकट्ठी करता है
उपाधियां कि वह एम.ए. है,
कि पीएच.डी. है, कि डी.लिट. है,
कि कितनी ऑननेरी डिग्रियां उसने ले रखी हैं।
अगर तुम अज्ञानी के घर में जाओ
तो वह सर्टिफिकेट दीवाल पर लगा रखता है।
वह प्रदर्शन कर रहा है कि मैं जानता हूं।

लेकिन यह प्रदर्शन ही बताता है
कि भीतर उसे भी पता है
कि कुछ जानता नहीं है।
परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली हैं,
प्रमाणपत्र इकट्ठे कर लिए हैं।

लेकिन जानने का न तो
परीक्षाओं से संबंध है,
न प्रमाणपत्रों से।
जानना तो जीवन के अनुभव से संबंधित है।
जानना तो जी-जीकर घटित होता है,
परीक्षाओं से उपलब्ध नहीं होता।
परीक्षाओं से तो इतना ही पता चलता है
कि तुम्हारे पास अच्छी यांत्रिक स्मृति है।
तुम वही काम कर सकते हो
जो कंप्यूटर कर सकता है।
लेकिन इससे बुद्धिमत्ता का
कोई पता नहीं चलता।
बुद्धिमत्ता बड़ी और बात है;
कालेजों, स्कूलों और
विश्वविद्यालयों में नहीं मिलती।
उसका तो एक ही विश्वविद्यालय है,
यह पूरा अस्तित्व।
यहीं जीकर, उठ कर, गिर कर,
तकलीफ से, पीड़ा से, निखार से,
जल कर आदमी धीरे-धीरे निखरता है,
परिष्कृत होता है।

Why does a man fall in love with a woman?

Why does a man fall in love with a woman? – because he carries a woman inside him, otherwise he would not fall in love. And why do you fall in love with a certain woman?

There are thousands of women. But why, suddenly, does a certain woman become most important to you, as if all other women had disappeared and that were the only woman in the world. Why?

Why does a certain man attract you? Why, at first sight, does something suddenly click? Tantra says: You are carrying an image of a woman inside you, an image of a man inside you. Each man is carrying a woman and each woman is carrying a man. When somebody on the outside fits with your inner image, you fall in love – that is the meaning of love. – OSHO

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संतुलन—‘’ध्‍यान’’

लाआत्‍से के साधना-सूत्रों में एक गुप्‍त सूत्र आपको कहता हुँ, जो उसकी किताबों में उल्लिखित नहीं है, लेकिन कानों-कान लाओत्‍से की परंपरा में चलता रहा है। वह लाओत्‍से की ध्‍यान पद्धति का यह है।

लाआत्‍से कहता है कि पालथी मार कर बैठ जाएं और भीतर ऐसा अनुभव कर कि एक तराजू है, बैलेंस लाओत्‍से के साधना-सूत्रों में एक गुप्‍त सुत्र आपको कहता हूँ, बैलेंस, एक तराजू। उसके दोनों पलड़े आपकी दोनों छातियों के पास लटके हुए है और उसका कांटा ठीक आपकी दोनों आंखों के बीच, तीसरी आँख जहां समझी जाती है, वहां उसका कांटा है। तराजू की डंडी आपके मस्तिष्‍क में है। दोनों उसके पलड़ों को अन्‍दर से ऐसे महसूस करें की बराबर है, और दोनों का कांटा तराजू की ठीक बीच में है।

लाओत्‍से कहता है कि अगर भीतर उस तराजू को साध लिया, तो सब सध जाएगा।

लेकिन आप बड़ी मुश्किल में पड़ेंगे, जरा इसका प्रयोग करेंगे, तब आपको पता चलेगा। जरा सी श्‍वास भी ली नहीं कि एक पलड़ा नीचा हो जाएगा, एक पलड़ा ऊपर हो जाएगा। अकेले बैठे है, और एक आदमी बाहर से निकल गया दरवाजे से। उसको देख कर ही, अभी उसने कुछ किया भी नहीं, एक पलड़ा नीचा, एक ऊपर हो जाएगा।

लाआत्‍से ने कहा है कि भीतर चेतना को एक संतुलन, दोनों विपरीत द्वंद्व एक से हो जाएं और कांटा बीच में बना रहे।

जीवन में सुख हो या दुःख, सम्‍मान या अपमान, अँधेरा या उजाला, भीतर के तराजू को साधते चला जाए कोई, तो एक दिन उस परम संतुलन पर आ जाता है, जहां जीवन तो नहीं होता, आस्तित्‍व होता है; जहां लहर नहीं होती है; जहां मैं नहीं होता, सब होता है।

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अपनी मूर्खता

टालस्टाय ने एक छोटी सी कहानी लिखी है।
मृत्यु के देवता ने अपने एक दूत को भेजा पृथ्वी पर।
एक स्त्री मर गयी थी, उसकी आत्मा को
लाना था। देवदूत आया, लेकिन चिंता में पड़
गया। क्योंकि तीन छोटी-छोटी लड़कियां
जुड़वां–एक अभी भी उस मृत स्त्री के स्तन से लगी
है। एक चीख रही है, पुकार रही है। एक रोते-रोते
सो गयी है, उसके आंसू उसकी आंखों के पास सूख
गए हैं–तीन छोटी जुड़वां बच्चियां और स्त्री मर
गयी है, और कोई देखने वाला नहीं है। पति पहले
मर चुका है। परिवार में और कोई भी नहीं है। इन
तीन छोटी बच्चियों का क्या होगा?
उस देवदूत को यह खयाल आ गया, तो वह खाली
हाथ वापस लौट गया। उसने जा कर अपने प्रधान
को कहा कि मैं न ला सका, मुझे क्षमा करें,
लेकिन आपको स्थिति का पता ही नहीं है।
तीन जुड़वां बच्चियां हैं–छोटी-छोटी, दूध
पीती। एक अभी भी मृत स्तन से लगी है, एक
रोते-रोते सो गयी है, दूसरी अभी चीख-पुकार
रही है। हृदय मेरा ला न सका। क्या यह नहीं हो
सकता कि इस स्त्री को कुछ दिन और जीवन के दे
दिए जाएं? कम से कम लड़कियां थोड़ी बड़ी हो
जाएं। और कोई देखने वाला नहीं है।
मृत्यु के देवता ने कहा, तो तू फिर समझदार हो
गया; उससे ज्यादा, जिसकी मर्जी से मौत
होती है, जिसकी मर्जी से जीवन होता है! तो
तूने पहला पाप कर दिया, और इसकी तुझे सजा
मिलेगी। और सजा यह है कि तुझे पृथ्वी पर चले
जाना पड़ेगा। और जब तक तू तीन बार न हंस लेगा
अपनी मूर्खता पर, तब तक वापस न आ सकेगा।
इसे थोड़ा समझना। तीन बार न हंस लेगा अपनी
मूर्खता पर–क्योंकि दूसरे की मूर्खता पर तो
अहंकार हंसता है। जब तुम अपनी मूर्खता पर हंसते
हो तब अहंकार टूटता है।
देवदूत को लगा नहीं। वह राजी हो गया दंड
भोगने को, लेकिन फिर भी उसे लगा कि सही
तो मैं ही हूं। और हंसने का मौका कैसे आएगा?
उसे जमीन पर फेंक दिया गया। एक चमार,
सर्दियों के दिन करीब आ रहे थे और बच्चों के
लिए कोट और कंबल खरीदने शहर गया था, कुछ
रुपए इकट्ठे कर के। जब वह शहर जा रहा था तो
उसने राह के किनारे एक नंगे आदमी को पड़े हुए,
ठिठुरते हुए देखा। यह नंगा आदमी वही देवदूत है
जो पृथ्वी पर फेंक दिया गया था। उस चमार
को दया आ गयी। और बजाय अपने बच्चों के लिए
कपड़े खरीदने के, उसने इस आदमी के लिए कंबल और
कपड़े खरीद लिए। इस आदमी को कुछ खाने-पीने
को भी न था, घर भी न था, छप्पर भी न था
जहां रुक सके। तो चमार ने कहा कि अब तुम मेरे
साथ ही आ जाओ। लेकिन अगर मेरी पत्नी
नाराज हो–जो कि वह निश्चित होगी,
क्योंकि बच्चों के लिए कपड़े खरीदने लाया था,
वह पैसे तो खर्च हो गए–वह अगर नाराज हो,
चिल्लाए, तो तुम परेशान मत होना। थोड़े दिन
में सब ठीक हो जाएगा।
उस देवदूत को ले कर चमार घर लौटा। न तो चमार
को पता है कि देवदूत घर में आ रहा है, न पत्नी
को पता है। जैसे ही देवदूत को ले कर चमार घर में
पहुंचा, पत्नी एकदम पागल हो गयी। बहुत
नाराज हुई, बहुत चीखी-चिल्लायी।
और देवदूत पहली दफा हंसा। चमार ने उससे कहा,
हंसते हो, बात क्या है? उसने कहा, मैं जब तीन
बार हंस लूंगा तब बता दूंगा।
देवदूत हंसा पहली बार, क्योंकि उसने देखा कि
इस पत्नी को पता ही नहीं है कि चमार देवदूत
को घर में ले आया है, जिसके आते ही घर में
हजारों खुशियां आ जाएंगी। लेकिन आदमी देख
ही कितनी दूर तक सकता है! पत्नी तो इतना
ही देख पा रही है कि एक कंबल और बच्चों के पकड़े
नहीं बचे। जो खो गया है वह देख पा रही है, जो
मिला है उसका उसे अंदाज ही नहीं है–मुफ्त! घर में
देवदूत आ गया है। जिसके आते ही हजारों
खुशियों के द्वार खुल जाएंगे। तो देवदूत हंसा। उसे
लगा, अपनी मूर्खता–क्योंकि यह पत्नी भी
नहीं देख पा रही है कि क्या घट रहा है!
जल्दी ही, क्योंकि वह देवदूत था, सात दिन में
ही उसने चमार का सब काम सीख लिया। और
उसके जूते इतने प्रसिद्ध हो गए कि चमार महीनों
के भीतर धनी होने लगा। आधा साल होते-होते
तो उसकी ख्याति सारे लोक में पहुंच गयी कि
उस जैसा जूते बनाने वाला कोई भी नहीं,
क्योंकि वह जूते देवदूत बनाता था। सम्राटों के
जूते वहां बनने लगे। धन अपरंपार बरसने लगा।
एक दिन सम्राट का आदमी आया। और उसने कहा
कि यह चमड़ा बहुत कीमती है, आसानी से
मिलता नहीं, कोई भूल-चूक नहीं करना। जूते ठीक
इस तरह के बनने हैं। और ध्यान रखना जूते बनाने हैं,
स्लीपर नहीं। क्योंकि रूस में जब कोई आदमी मर
जाता है तब उसको स्लीपर पहना कर मरघट तक ले
जाते हैं। चमार ने भी देवदूत को कहा कि स्लीपर
मत बना देना। जूते बनाने हैं, स्पष्ट आज्ञा है, और
चमड़ा इतना ही है। अगर गड़बड़ हो गयी तो हम
मुसीबत में फंसेंगे।
लेकिन फिर भी देवदूत ने स्लीपर ही बनाए। जब
चमार ने देखे कि स्लीपर बने हैं तो वह क्रोध से
आगबबूला हो गया। वह लकड़ी उठा कर उसको
मारने को तैयार हो गया कि तू हमारी फांसी
लगवा देगा! और तुझे बार-बार कहा था कि
स्लीपर बनाने ही नहीं हैं, फिर स्लीपर
किसलिए?
देवदूत फिर खिलखिला कर हंसा। तभी आदमी
सम्राट के घर से भागा हुआ आया। उसने कहा, जूते
मत बनाना, स्लीपर बनाना। क्योंकि सम्राट
की मृत्यु हो गयी है।
भविष्य अज्ञात है। सिवाय उसके और किसी
को ज्ञात नहीं। और आदमी तो अतीत के आधार
पर निर्णय लेता है। सम्राट जिंदा था तो जूते
चाहिए थे, मर गया तो स्लीपर चाहिए। तब वह
चमार उसके पैर पकड़ कर माफी मांगने लगा कि
मुझे माफ कर दे, मैंने तुझे मारा। पर उसने कहा, कोई
हर्ज नहीं। मैं अपना दंड भोग रहा हूं।
लेकिन वह हंसा आज दुबारा। चमार ने फिर पूछा
कि हंसी का कारण? उसने कहा कि जब मैं तीन
बार हंस लूं…।
दुबारा हंसा इसलिए कि भविष्य हमें ज्ञात नहीं
है। इसलिए हम आकांक्षाएं करते हैं जो कि व्यर्थ
हैं। हम अभीप्साएं करते हैं जो कि कभी पूरी न
होंगी। हम मांगते हैं जो कभी नहीं घटेगा।
क्योंकि कुछ और ही घटना तय है। हमसे बिना
पूछे हमारी नियति घूम रही है। और हम व्यर्थ ही
बीच में शोरगुल मचाते हैं। चाहिए स्लीपर और हम
जूते बनवाते हैं। मरने का वक्त करीब आ रहा है और
जिंदगी का हम आयोजन करते हैं।
तो देवदूत को लगा कि वे बच्चियां! मुझे क्या
पता, भविष्य उनका क्या होने वाला है? मैं
नाहक बीच में आया।
और तीसरी घटना घटी कि एक दिन तीन
लड़कियां आयीं जवान। उन तीनों की शादी
हो रही थी। और उन तीनों ने जूतों के आर्डर
दिए कि उनके लिए जूते बनाए जाएं। एक बूढ़ी
महिला उनके साथ आयी थी जो बड़ी धनी
थी। देवदूत पहचान गया, ये वे ही तीन लड़कियां
हैं, जिनको वह मृत मां के पास छोड़ गया था और
जिनकी वजह से वह दंड भोग रहा है। वे सब स्वस्थ
हैं, सुंदर हैं। उसने पूछा कि क्या हुआ? यह बूढ़ी
औरत कौन है? उस बूढ़ी औरत ने कहा कि ये मेरी
पड़ोसिन की लड़कियां हैं। गरीब औरत थी, उसके
शरीर में दूध भी न था। उसके पास पैसे-लत्ते भी
नहीं थे। और तीन बच्चे जुड़वां। वह इन्हीं को दूध
पिलाते-पिलाते मर गयी। लेकिन मुझे दया आ
गयी, मेरे कोई बच्चे नहीं हैं, और मैंने इन तीनों
बच्चियों को पाल लिया।
अगर मां जिंदा रहती तो ये तीनों बच्चियां
गरीबी, भूख और दीनता और दरिद्रता में बड़ी
होतीं। मां मर गयी, इसलिए ये बच्चियां तीनों
बहुत बड़े धन-वैभव में, संपदा में पलीं। और अब उस
बूढ़ी की सारी संपदा की ये ही तीन मालिक
हैं। और इनका सम्राट के परिवार में विवाह हो
रहा है।
देवदूत तीसरी बार हंसा। और चमार को उसने
कहा कि ये तीन कारण हैं। भूल मेरी थी।
नियति बड़ी है। और हम उतना ही देख पाते हैं,
जितना देख पाते हैं। जो नहीं देख पाते, बहुत
विस्तार है उसका। और हम जो देख पाते हैं उससे
हम कोई अंदाज नहीं लगा सकते, जो होने वाला
है, जो होगा। मैं अपनी मूर्खता पर तीन बार हंस
लिया हूं। अब मेरा दंड पूरा हो गया और अब मैं
जाता हूं।
नानक जो कह रहे हैं, वह यह कह रहे हैं कि तुम अगर
अपने को बीच में लाना बंद कर दो, तो तुम्हें
मार्गों का मार्ग मिल गया। फिर असंख्य
मार्गों की चिंता न करनी पड़ेगी। छोड़ दो उस
पर। वह जो करवा रहा है, जो उसने अब तक
करवाया है, उसके लिए धन्यवाद। जो अभी
करवा रहा है, उसके लिए धन्यवाद। जो वह कल
करवाएगा, उसके लिए धन्यवाद। तुम बिना

लिखा चेक धन्यवाद का उसे दे दो। वह जो भी
हो, तुम्हारे धन्यवाद में कोई फर्क न पड़ेगा।
अच्छा लगे, बुरा लगे, लोग भला कहें, बुरा कहें,
लोगों को दिखायी पड़े दुर्भाग्य या
सौभाग्य, यह सब चिंता तुम मतलिखा चेक धन्यवाद का उसे दे दो। वह जो भी
हो, तुम्हारे धन्यवाद में कोई फर्क न पड़ेगा।
अच्छा लगे, बुरा लगे, लोग भला कहें, बुरा कहें,
लोगों को दिखायी पड़े दुर्भाग्य या
सौभाग्य, यह सब चिंता तुम मत
लिखा चेक धन्यवाद का उसे दे दो। वह जो भी
हो, तुम्हारे धन्यवाद में कोई फर्क न पड़ेगा।
अच्छा लगे, बुरा लगे, लोग भला कहें, बुरा कहें,
लोगों को दिखायी पड़े दुर्भाग्य या
सौभाग्य, यह सब चिंता तुम मत

अजनबी

तुम्हें इस सत्य को स्वीकारना होगा
कि तुम अकेले हो..
हो सकता है कि तुम भीड़ में होओ,
पर तुम अकेले जी रहे हो;
हो सकताहै कि अपनी पत्नी के साथ,
गर्लफ्रेँड के साथ,
ब्वॉयफ्रेँड के साथ,
लेकिन वे
अपने अकेलेपन के साथ अकेले हैं,
तुम अपने अकेलेपन के साथ अकेले हो,
और ये अकेलेपन एक-दूसरे को
छूते भी नहीं हैं,
एक-दूसरे को कभी भी नहीं छूते हैं।

हो सकता है
कि तुम किसी के साथ बीस साल,
तीस साल, पचास साल रहते हो..
इससे कोई फर्क नहीं पड़ताहै,
तुम अजनबी बने रहोगे।
हमेशा और हमेशा तुम अजनबी होओगे।

इस तथ्य को स्वीकारो
कि हम यहां पर अजनबी हैं;
कि हम नहीं जानते कि तुम कौन हो,
कि हम नहीं जानते कि मैं कौन हूं।
मैं स्वयं नहीं जानता कि मैं कौन हूं,
तो तुम कैसे जान सकते हो?
लेकिन लोग अनुमान लगाते हैं
कि पत्नी ने पति को जानना चाहिए,
पति यह अनुमान लगाता है
कि पत्नी को पति ने जानना चाहिए।
सभी इस तरह से बरताव कर रहे हैं
जैसे कि सभी को
मन को पढ़ने वाला होना चाहिए,
और इसके पहले कि तुम कहो,
तुम्हारी जरूरत को,
तुम्हारी समस्याओं को
उससे जानना चाहिए।
उसे जानना चाहिए..
और उन्हें कुछ करना चाहिए।
अब यह सारी बातें नासमझी हैं।

तुम्हें कोई नहीं जानता,
तुम भी नहीं जानते,
इसलिए अपेक्षा मत करो
कि सभी को तुम्हें जानना चाहिए;
चीजों की प्रकृति के अनुसार
यह संभव नहीं है।

हम अजनबी हैं।
शायद संयोगवश हम साथ हैं,
लेकिन हमारा अकेलापन होगा ही।
इसे मत भूलो,
क्योंकि तुम्हें इसके ऊपर कार्य करना होगा।
सिर्फ वहां से तुम्हारी मुक्ति,
तुम्हारा मोक्ष संभवहै।
लेकिन तुम इससे ठीक उल्टा कर रहे हो :
कैसे अपने अकेलेपन को भूलो?
ब्वॉयफ्रेँड, गर्लफ्रेँड, सिनेमा चले जाओ,
फुटबाल मैच देखो;
भीड़ में खो जाओ,
डिस्को में नाचो,
स्वयं को भूल जाओ,
शराब पीओ, ड्रग्स ले लो,
लेकिन किसी भी तरह से
अपने अकेलेपन को,
अपने सचेतन मन तक मत आने दो..

और सारा रहस्य यहीं पर है।
तुम्हें अपने अकेलेपन को स्वीकारना होगा,
जिसे तुम किसी भी तरह से टाल नहीं सकते।
और इसके स्वभाव को बदलने का
कोई मार्ग नहीं है।
यह प्रामाणिक वास्तविकता है।
यह तुम हो।

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भीतर जाओ

भीतर जाओ ताकि समृद्ध होओ और गरीब
ना बने रहो। और हमेशा याद रखो कि जब
कभी तुम थक जाते हो, ऊर्जा का स्रोत
भीतर है। अपनी आंखें बंद कर लो और भीतर
जाओ। बाहरी रिश्ते बनाओ; निश्चित
ही वे बाहरी रिश्ते होंगे–तुम दुनिया में
रहोगे, व्यावसायिक संबंध भी होंगे–
लेकिन वे सब कुछ नहीं हो जाने चाहिए। खेल
के वे भी हिस्से हैं, लेकिन वहां कुछ बहुत ही
गोपनीय और निजी भी हों, कुछ जिसे तुम
स्वयं का अपना कह सको। भीतरी रिश्ता
भी बनाओ। मर्लिन मनरो में यही कमी रह
गई। वह सार्वजनिक स्त्री थी–सफल, पर
पूरी तरह से असफल। वह अपनी सफलता और
प्रसिद्धि के शिखर पर थी जब उसने
आत्महत्या की। उसके पास वह सब था
जिसके लिए जीया जा सके, तुम उससे
अधिक प्रसिद्धी, अधिक सफलता, अधिक
करिश्मा, अधिक सुंदरता, अधिक स्वास्थ्य
की कल्पना भी नहीं कर सकते। सब कुछ उसके
पास था, उससे
अधिक कुछ नहीं हो सकता
था, और तब भी कुछ कमी थी। भीतर, अंतस
खाली था।

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