प्रेम स्‍वभाव की बात है। संबंध की बात नहीं है

प्रेम रिलेशनशिप नहीं है। प्रेम है ‘’स्‍टेट ऑफ माइंड’’ मनुष्‍य के व्‍यक्‍तित्‍व का भीतरी अंग है।

प्रेमपूर्ण आदमी प्रेमपूर्ण होता है। आदमी से कोई संबंध नहीं है उस बात का। अकेले में बैठता है तो भी प्रेमपूर्ण होता है। कोई नहीं होता तो भी प्रेमपूर्ण होता है। प्रेमपूर्ण होना उसके स्‍वभाव की बात है। वह आपसे संबंधित होने का सवाल नहीं है।

क्रोधी आदमी अकेले में भी क्रोधपूर्ण होता है। घृणा से भरा आदमी घृणा से भरा हुआ होता है। वह अकेले भी बैठा है तो आप उसको देख कर कह सकते है कि यह आदमी क्रोधी है, हालांकि वह किसी पर क्रोध नहीं कर रहा है। लेकिन उसका सारा व्‍यक्‍तित्‍व क्रोधी है।

प्रेम पूर्ण आदमी अगर अकेले में बैठा है, तो आप कहेंगे यह आदमी कितने प्रेम से भरा हुआ बैठा है।

फूल एकांत में खिलते है जंगल के तो वहां भी सुगंध बिखेरते रहते है। चाहे कोई सूंघने वाला हो या न हो। रास्‍तें से कोई निकले या न निकले। फूल सुगंधित होता रहता है। फूल का सुगंधित होना स्‍वभाव है। इस भूल में आप मत पड़ना कि आपके लिए सुगंधित हो रहा है।

प्रेमपूर्ण होना व्‍यक्‍तित्‍व बनाना चाहिए। वह हमार व्‍यक्‍तित्‍व हो, इससे कोई संबंध नहीं कि वह किसके प्रति।

लेकिन जितने प्रेम करने वाले लोग है, वे सोचते है कि मेरे प्रति प्रेमपूर्ण हो जाये। और किसी के प्रति नहीं। और उनको पता नहीं है कि जो सबके प्रति प्रेम पूर्ण नहीं है वह किसी के प्रति भी प्रेम पूर्ण नहीं हो सकता।

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अपेक्षा

दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करना बंद करो, क्योंकि यह एक मात्र ढंग है जिससे तुमआत्महत्या कर सकते हो। तुम यहां किसी की भी अपेक्षाएं पूरी करने के लिए नहीं हो और कोई भी यहां तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करने के लिए नहीं हैं। दूसरों की अपेक्षाओं के कभी भी शिकार मत बनो और किसी दूसरे को अपनी अपेक्षाओं का शिकार मत बनाओ।यही है जिसे मैं निजता कहता हूं। अपनी निजता का सम्मान करो और दूसरों की निजता का भी सम्मान करो। कभी भी किसी के जीवन में हस्तक्षेप मत करो और किसी को भी अपनेजीवन में हस्तक्षेप मत करने दो। सिर्फ तब ही एक दिन तुम आध्यात्मिकता में विकसितहो सकते हो।वर्ना, नन्यानबे प्रतिशत लोग आत्महत्या करते हैं। उनका सारा जीवन और कुछ नहीं बस धीमी गति से आत्महत्या है। यह अपेक्षा और वह अपेक्षा पूरी करते हुए…किसी दिन पिता, किसी दिन माता, किसी दिन पत्नी, पति, फिर बच्चे आते हैं–वे अपेक्षाएं करते हैं। फिर समाज आ जाता है, पंडित और राजनेता। चारों तरफ सभी अपेक्षाएं कर रहेहैं। और तुम बेचारे वहां हो, बस बेचारे मनुष्य–और सारी दुनिया तुमसे अपेक्षा कर रही है कि यह करो और वह करो। और तुम दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते, क्योंकि वे बड़ी विरोधाभासी हैं।तुम दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करते हुए पागल हो गए हो। और तुमने किसी की भी अपेक्षा पूरी नहीं की है। कोई भी प्रसन्न नहीं है। तुम हार गए, नष्ट हो गए और कोईभी प्रसन्न नहीं है। जो लोग स्वयं के साथ खुश नहीं हैं वे प्रसन्न नहीं हो सकते।तुम कुछ भी कर लो, वे तुम्हारे साथ अप्रसन्न होने के मार्ग ढूंढ़ लेंगे, क्योंकि वे प्रसन्न नहीं हो सकते।प्रसन्नता एक कला है जो तुम्हें सीखनी होती है। इसका तुम्हारे करने या न करने सेकुछ लेना देना नहीं है।सुखी करने की जगह, प्रसन्न होने की कला सीखो।

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गहरा प्रेम

अगर तुम बहुत गहरे प्रेम में हो तो तुम मौन हो जाओगे। तब तुम अपनी प्रेमिका से बोल न सकोगे। और यदि बोलोगे भी तो नाम के लिए ही। बातचीत संभव नहीं है। प्रेम जब गहराता है तब शब्द व्यर्थ हो जाते हैं, तुम चुप हो जाते हो। अगर तुम अपनी प्रेमिका के साथ मौन नहीं रह सकते हो तो भलीभांति समझ लो कि प्रेम नहीं है। क्योंकि जिससे तुम्हें प्रेम नहीं है उसके पास चुप रहना बहुत कठिन होता है। किसी अजनबी के साथ तुम तुरंत बातचीत में लग जाते हो।

अगर तुम रेलगाड़ी या बस से यात्रा कर रहे हो तो तुम तुरंत बातचीत में लग जाते हो। क्‍योंकि अजनबी के बगल में चुप बैठना कठिन मालूम होता है, भद्दा मालूम होता है। और चूंकि कोई दूसरा सेतु नहीं बन पाता इसलिए तुम भाषा का सेतु निर्मित कर लेते हो। अजनबी के साथ आंतरिक सेतु संभव नहीं है। तुम अपने में बंद हो; वह अपने में बंद है। मानो दो बंद घेरे अगल—बगल में बैठे हों। और डर है कि कहीं वे आपस में टकरा न जाएं, कोई खतरा न हो जाए। इसलिए तुम सेतु बना लेते हो, इसलिए तुम बातचीत करने लगते हो, इसलिए तुम मौसम या किसी भी चीज पर बातचीत करने लगते हो, वह कोई भी बेकार की बात हो सकती है। लेकिन उससे तुम्हें एहसास होता है कि तुम जुड़े हो और संवाद चल रहा है।

चूकि प्रेमी मौन हो जाते हैं। और जब दो प्रेमी फिर बातचीत करने लग जाएं तो समझ लेना कि प्रेम विदा हो चुका है, कि वे फिर अजनबी हो गए हैं। जाओ और पति—पत्नियों को देखो, जब वे अकेले होते हैं तो वे किसी भी चीज के बारे में बातचीत करते रहते हैं। और वे दोनों जानते हैं कि बातचीत गैर—जरूरी है। लेकिन चुप रहना कितना कठिन है! इसलिए किसी क्षुद्र सी बात पर भी बात किए जाओ, ताकि संवाद चलता रहे।

लेकिन दो प्रेमी मौन हो जाएंगे। भाषा खो जाएगी; क्योंकि भाषा बुद्धि की चीज है। शुरुआत तो बच्चों जैसी बातचीत से होगी, लेकिन फिर वह नहीं रहेगी। तब वे मौन में संवाद करेंगे। उनका संवाद क्या है? उनका संवाद अतर्क्य है, वे अस्तित्व के एक भिन्न आयाम के साथ लयबद्ध हो जाते हैं। और वे उस लयबद्धता में सुखी अनुभव करते हैं। और अगर तुम उनसे पूछो कि उनका सुख क्या है, तो वे उसे प्रमाणित नहीं कर सकते

अब तक कोई प्रेमी प्रमाणित नहीं कर सका है कि प्रेम में उन्हें सुख क्यों होता है। क्यों? प्रेम तो बहुत पीड़ा, बहुत दुख लाता है, तथापि प्रेमी सुखी है। प्रेम में एक गहरी पीड़ा है। क्योंकि जब तुम किसी से एक होते हो तो उसमें अड़चन आती है। प्रेम में दो मन एक हो जाते हैं; यह केवल दो शरीरों के एक होने की बात नहीं है।

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ओशो

धैर्य

बुद्ध को एक सभा में भाषण
करना था । जब समय
हो गया तो बुद्ध आए और बिना कुछ
बोले ही वहाँ से चल गए । तकरीबन एक
सौ पचास के करीब श्रोता थे । दूसरे
दिन तकरीबन सौ लोग थे पर फिर
उन्होंने ऐसा ही किया बिना बोले
चले गए ।इस बार पचास कम हो गए ।
तीसरा दिन हुआ साठ के करीब लोग
थे महात्मा बुद्ध आए, इधर – उधर
देखा और बिना कुछ कहे वापिस चले
गए । चौथा दिन हुआ तो कुछ लोग
और कम हो गए तब भी नहीं बोले । जब
पांचवां दिन हुआ तो देखा सिर्फ़
चौदह लोग थे । महात्मा बुद्ध उस दिन
बोले और चौदोहों लोग उनके साथ
हो गए ।
किसी ने महात्मा बुद्ध
को पूछा आपने चार दिन कुछ
नहीं बोला । इसका क्या कारण
था । तब बुद्ध ने कहा मुझे भीड़
नहीं काम करने वाले चाहिए थे ।
यहाँ वो ही टिक सकेगा जिसमें धैर्य
हो । जिसमें धैर्य था वो रह गए।
केवल भीड़ ज्यादा होने से कोई
नहीं फैलता है । समझने वाले चाहिए,
तमाशा देखने वाले रोज इधर – उधर
ताक-झाक करते है । समझने
वाला धीरज रखता है । कई
लोगों को दुनिया का तमाशा अच्छा
लगता है । समझने वाला शायद
हजार में एक
ही हो ऐसा ही देखा जाता है।

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ओशो

जगत मे कोई चुनाव न रहे

इस जगत से जो कुछ नही मांगता,ये जगत उसे फंसा नहीँ सकता।
इस जगत मे मांगा कि फंसे।
जो मांगा था,मिल जाए तो भी फंसे,न मिले तो भी फंस गए।
मिलने न मिलने से कोई संबंध नहीँ है।
मछुए कांटे मे आटा लगा कर पानी मे डाल रखते हैँ।
केवल वही मछली बचेगी,जो मुंह खोलेगी ही नहीँ।
जिस मछली ने मुंह खोला,वह फंसी।
सभी मछलियां आटे के लिये मुंह खोलती हैँ।
कोई मछली इतनी नासमझ नहीँ कि कांटे के लिये मुंह खोले।
मछुआ भी इसलिये कांटे मे आटा लगा कर पानी मे डाल कर बैठा हुआ है।
मछली फंसती है आटे के कारण।
सभी लोग सुख चाहते हैँ और दुख का कांटा सुख मे से निकल आता है।
सभी लोग सम्मान चाहते हैँ और सम्मान मे से ही अपमान का कांटा निकल आता है।
सभी लोग शांति चाहते हैँ और शांति ही अशांति बन जाती है।
उस मछली का खयाल करे जो आटेँ और कांटे मे से चुनाव ही नहीँ करती;जो उदासीन इस आटे के पास से तैरती हुई चली जाती है। इसे पकड़ना असंभव है।
ऐसी मछली की तरह हो जाए जगत मे कि कोई चुनाव न रहे।
जो चुनती ही नहीँ,जो मांग नहीँ करती।
फिर
उस मनुष्य पर कोई बंधन हो नहीँ सकता।
विकल्प मे चुनाव छोड़ दे मनुष्य।
जो निर्विकल्प हो जाता है,उसका चैतन्य से साक्षात्कार होता है।
क्योँकि जो बाहर चुनाव नहीँ करता-
न चुनता है
सुख को,
न दुख को,
न प्रेम को,
न घृणा को,
न संसार को,
न मोक्ष को,
न पदार्थ को,
न परमात्मा को-
जो बाहर चुनता ही नहीँ,जिसके सब चुनाव क्षीण हो जाते हैँ,वह तत्काल भीतर पहुंच जाता है,क्योँकि चुनाव मे ही चेतना अटकती है बाहर।
जिसे चुनता है मनुष्य उसमे अटक जाता है।
जब चुनाव न रहा तो अटकाव समाप्त हो गया, संबंध भीतर से जुड़ गया,वह भीतर की धारा मे लीन हो जाता है।
तब हृदय की अज्ञानरुपी गांठ पूर्णतः नष्ट हो जाती है।
‘आत्मा के ऊपर ही आत्म-भाव को दृढ़ करके अहंकार आदि के ऊपर जो आत्म-भाव है,उसे त्याग देना।घड़ा,वस्त्र आदि पदार्थों से जिस प्रकार उदासीन भाव से रहा जाता है,उसी प्रकार अहंकार आदि की तरफ से भी उदासीन भाव से रहना।’
उदासीन का अर्थ है-चुनावरहित रहना।
कोई प्रयोजन नहीँ,ऐसे रहना।
जैसे घर मे वस्त्र है,घड़ा है,और सामान है,मनुष्य निकलता चला जाता है।उन पर कोई ध्यान नहीँ देता।
ऐसे ही भीतर अहंकार है,
सुख है,
दुख है,
चिंताएं है,
ये सामान है भीतर के।
इनके बीच से तटस्थता से गुजर जाना है।

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जवान रहना है तो मौन हो जाओ? –आइंस्‍टीन की क्रांतिकारी खोज

अल्‍बर्ट आइंस्टीन ने खोज की और निश्‍चित ही यह सही होगी, क्‍योंकि अंतरिक्ष के बारे में इस व्‍यक्‍ति ने बहुत कठोर परिश्रम किया था। उसकी खोज बहुत गजब की है। उसने स्‍वयं ने कई महीनों तक इस खोज को अपने मन में रखी और विज्ञान जगत को इसकी सूचना नहीं दी क्‍योंकि उसे भय था कि कोई उस पर विश्‍वास नहीं करेगा। खोज ऐसी थी कि लोग सोचेंगे कि वह पागल हो गया है। परंतु खोज इतनी महत्‍वपूर्ण थी की उसने अपनी बदनामी की कीमत पर जग जाहिर करने का तय किया।
खोज यह थी कि गुरुत्वाकर्षण के बाहर तुम्‍हारी उम्र बढ़नी रूक जाती है। यदि आदमी दूर के किसी ग्रह पर जाए और उसे वहां तक पहुंचने में तीस साल लगे और फिर तीस साल में नीचे आये, और जब उसने पृथ्‍वी को छोड़ा था उसकी उम्र तीस साल थी, तब यदि तुम सोचो कि जब वह पुन: आए तब वह नब्‍बे साल का होगा, तो तुम गलत हो, वह अब भी तीस साल का ही होगा। उसके सभी दोस्‍त और संगी साथी कब्र में जा चुके होंगे। शायद एक या दो अब भी जिंदा हो परंतु उनका एक पैर कब्र में होगा। परंतु वह उतना ही जवान होगा जितना तब था जब उसने जमीन को छोड़ा था।
जिस क्षण तुम गुरुत्वाकर्षण के बाहर जाते हो, उम्र की प्रक्रिया रूक जाती है। उम्र बढ़ रही है तुम्‍हारे शरीर पर एक निश्‍चित दबाव के कारण। जमीन लगातार तुम्‍हें खींच रही है और तुम इस खिंचाव से लड़ रहे हो। तुम्‍हारी ऊर्जा इस खींच रही है और तुम इस खिंचाव से लड़ रहे हो। तुम्‍हारी ऊर्जा इस खिंचाव सक बाधित होती है। व्‍यय होती है। परंतु एक बार जब तुम इस जमीन के गुरुत्वाकर्षण से बहार हो जाते हो तुम वैसे ही बने रहते हो जैसे हो। तुम अपने समसामयिक लोगों को नहीं पाओगे, तुम वह फैशन नहीं पाओगे जो तुमने छोड़ी थी। तुम पाओगे कि साठ साल बीत गये।
परंतु गुरुत्वाकर्षण के बाहर होने की अनुभूति ध्‍यान में भी पाई जा सकती है—ऐसा होता है। और यह कई लोगों को भटका देती है। अपनी बंद आँखो के साथ जब तुम पूरी तरह से मौन हो तुम गुरुत्वाकर्षण के बाहर हो। परंतु मात्र तुम्‍हारा मौन गुरुत्वाकर्षण के बाहर है, तुम्‍हारा शरीर नहीं। परंतु उस क्षण में जब तुम अपने मौन से एकाकार होते हो, तुम महसूस करते हो कि तुम ऊपर उठ रहे हो। इसे योग में ‘’हवा में उड़ना’’ कहते है।
और बिना आंखे खोले तुम्‍हें लगेगा कि यह मात्र लगता ही नहीं बल्‍कि तुम्‍हारा शरीर मौन गुरुत्वाकर्षण के बाहर है—यक सच्‍चा अनुभव है। परंतु अभी भी तुम शरीर के साथ एकाकार हो। तुम महसूस करते हो कि तुम्‍हारा शरीर उठ रहा है। यदि तुम आँख खोलोगे तो पाओगे कि तुम उसी आसन में जमीन पर बैठे हो।

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शारीर की सबसे कीमती जगह

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जब आदमी उदास होता है, दुःख होता है चिंतित होता है, तो माथे पर हाथ रखता है। उससे चिंता बिखर जाती हे। उस समय जो इकट्ठा है वह बिखर जाता है। निगेटिव कुछ होगा तो माथे पर हाथ रखने से बिखर जाता है। पाजीटिव कुछ होगा तो माथे पर हाथ रखने से इक्कठ्ठा हो जाता है।

इस लिए मैंने कहा: जब प्रसन्‍न क्षण हो मन को कोई,लेट जाएं, माथे पर एक क्षण रगड़ लें जोर से हाथ से, अपने ही हाथ से। वह जगह बीच में जो है, वह बहुत कीमती जगह है। शरीर में शायद सर्वाधिक कीमती जगह है। वह अध्‍यात्‍म का सारा राज छिपा है। थर्ड आई, कोई कहता है उसे कोई शिवनेत्र, उसे कोई भी कुछ नाम देता हो, पर वहां राज छिपा है। उस पर हाथ रगड़ लें। उस पर हाथ रगड़ने के बाद जब आपको लगे कि प्रसन्‍नता सारे शरीर से दौड़ने लगी है उस तरफ, आँख बंद ही रखें, और सोचें कि मेरा सिर कहां हे। खयाल करें आप आँख बंद करके कि मेरा सर कहां है।

आपको बराबर पता चल जाएगा कि सिर कहां है। सब को पता है, अपना सिर कहां है। फिर एक क्षण के लिए सोचें कि मेरा सिर जो है, वह छ: इंच लंबा हो गया। आप कहेंगे, कैसे सोचेंगे।

यह बिलकुल सरल है, और एक दो दिन में आपको अनुभव में आ जाएगा कि माथा छ: इंच लंबा हो गया। आँख बंद किए। फिर वापिस लौट आएं, नार्मल हो जाएं, अपनी खोपड़ी के अंदर वापिस आ जाएं। फिर छ: इंच पीछे लोटे, फिर वापस लोटे, पाँच सात बार करें।

जब आपको यह पक्‍का हो जाए कि यह होने लगा, तब सोचें कि पूरा शरीर मेरा जो है। वह कमरे के बराबर बड़ा हो गया है। सिर्फ सोचना, जस्ट ए थाट, एंड दि थिंग हैपेंस। क्‍योंकि जैसे ही वह तीसरे नेत्र के पास शक्‍ति आती हे। आप जो भी सोचें, वह हो जाता हे। इसलिए इस तरफ शक्‍ति लाकर कभी भी कुछ भूलकर गलत नहीं सोच लेना, वरना ……..

इस लिए इस तीसरे नेत्र के संबंध में बहुत लोगों को नहीं कहा जाता है। क्‍योंकि इससे बहुत संबंधित द्वार हैं। यह करीब-करीब वैसी ही जगह है, जैसा पश्‍चिम का विज्ञान ऐटमिक एनर्जी के पास जाकर झंझट में पड़ गया है। वैसाही पूरब को योग इस बिंदु के पास आकर झंझट मैं पड़ गया था। और पूरब के मनीषी यों ने खोजा हजारों वर्षों तक, और फिर छिपाया इसको। क्‍योंकि आम आदमी के हाथ में पडा तो खतरा शुरू हो जाएगा।

अभी पश्‍चिम में वहीं हालत है। आइंस्टीन रोते-रोते मरा है, कि किसी तरह एटमिकएनर्जी के सीक्रेट खो जाए तो अच्‍छा हो। नहीं तो आदमी मर जाएगा।

पूरब भी एक दफा इस जगह आ गया था दूसरे बिंदु से, और उसने सीक्रेट खोज लिया था। और उससे बहुत उपद्रव संभव हो गए थे, और शुरू हो गए थे तो,उन्‍हें भुला देना पडा। पर यह छोटा-सा सूत्र मैं कहता हूं, इससे कोई बहुत ज्‍यादा खतरे नहीं हो सकते है। क्‍योंकि और गहरे सूत्र है, जो खतरे ला सकते है।

अपनी तरफ ध्यान खींचने का प्रयास भी एक रोग है

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हम प्रेम लिए आतुर होते हैं। तुम्हें पता
नहीं होगा कि क्यों? क्योंकि प्रेम
के बिना ध्यान नहीं मिलता। प्रेम
की तलाश वस्तुतः ध्यान की तलाश
है। कोई तुम पर ध्यान दे, तो तुम्हारे
भीतर जीवन का फूल खिलता है, बढ़ता है। कोई ध्यान
न दे, कुम्हला जाता है। इसलिए प्रेम की प्यास कि
कोई प्रेम करे, वस्तुतः प्रेम की नहीं है।
कोई ध्यान दे, कोई तुम्हारी तरफ देखे, कोई तुम्हारी
तरफ देख कर प्रसन्न हो, आनंदित हो, तो तुम बढ़ते हो।
मगर कभी-कभी यह रुग्ण रूप ले लेता है। रुग्ण रूप हर चीज
के होते हैं। प्रेम की खोज तो स्वस्थ है, लेकिन कोई
आदमी फिर यह भी कोशिश करता है कि किसी भी
तरह ध्यान मिले, तो खतरा हो जाता है।
तुम अगर जोर से रोओ-चिल्लाओ, तो लोगों का
ध्यान तुम्हारी तरफ आएगा। बच्चा सीख जाता है,
मां अगर उसे ठीक से प्रेम नहीं करती। जिस बच्चे को
मां ठीक से प्रेम करती है, वह रोता, चीखता,
चिल्लाता नहीं है। लेकिन जिसकी मां ठीक से प्रेम
नहीं करती, बच्चा ज्यादा रोता, चीखता,
चिल्लाता� है। क्योंकि अब वह एक तरकीब सीख
रहा है कि जब वह चिल्लाता है, तो मां ध्यान देती
है; सामान पटक देता है, तो मां ध्यान देती है; कोई
चीज तोड़ देता है, तो मां ध्यान देती है।
कभी आपने ख्याल किया कि आपके घर में मेहमान आ
जाएं, तो बच्चे ज्यादा चीजें पटकते हैं, ज्यादा उपद्रव
मचाते हैं, वे मेहमानों का ध्यान खींच रहे हैं। वैसे शांत
बैठे थे। और आप चाहते हैं कि जब मेहमान आएं तब वे शांत
रहें। वे कैसे शांत रहें? घर में और लोग आए हों, उनका
ध्यान…और मेहमान आपसे ही बातें कर रहे हैं और बच्चे
की तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं, तो बच्चा पच्चीस
उपद्रव करेगा ताकि आप ध्यान दो, मेहमान भी ध्यान
दें।
अनजाने चल रहा है। लेकिन ध्यान बढ़ोत्तरी का
हिस्सा है। वह बढ़ेगा, जितना ज्यादा ध्यान दिया
जाएगा। फिर लोग बीमार हो जाते हैं। जैसे एक
राजनीतिज्ञ है, वह भी और कुछ नहीं मांग रहा है। पद
पर हो कर मिलेगा क्या उसको? हजार तरह की
गालियां मिलेंगी, हजार तरह का अपमान मिलेगा,
हजार तरह की निंदा मिलेगी, और कुछ मिलने वाला
नहीं है।
लेकिन एक बात है, कि जब वह पद पर होगा, कुर्सी पर
होगा, तो ध्यान मिलेगा, चारों तरफ से लोग देखेंगे।
पद की खोज ध्यान की खोज है, लेकिन रुग्ण। क्योंकि
यह जो ध्यान है, इस तरह मांगना, जबर्दस्ती मांगना है,
हिंसात्मक है। जैसे बच्चा चीज तोड़ कर ध्यान मांग
रहा है, ऐसे ही राजनीतिज्ञ भी हिंसात्मक हो कर
ध्यान मांग रहा है।

sad Moments