मित्रता क्या है …?

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कौन तुम्हारा मित्र है ?
किसको तुम अपना मित्र कहते हो ?
क्योंकि सभी अपने स्वार्थों के लिए जी रहे हैं !
जिसको तुम मित्र कहते हो, वह भी अपने स्वार्थ के लिये तुमसे जुडे हैं, और तुम भी अपने स्वार्थ के लिये उनसे जुड़े हो ! अगर मित्र वक्त पर काम न आये, तुम्हारी अपेक्षा के अनुरूप तो तुम मित्रता तोड़ देते हो ! बुद्धिमान लोग कहते हैं मित्र तो वही , जो वक्त पर काम आये ! लेकिन क्यों ? वक्त पर काम आने का मतलब है कि जब मेरे स्वार्थ की जरूरत हो , तब वह सेवा को तत्पर रहे । लेकिन दूसरा भी यही सोचता है कि जब तुम वक्त पर काम आओ, तब मित्र हो ! लेकिन तुम काम में लाना चाहते हो दूसरे को यह कैसी मित्रता है ? तुम मित्रता के नाम पर दूसरे का शोषण करना चाहते हो, यह कैसा संबंध है ? तुम्हारे सब संबंध स्वार्थ के हैं ।

इतना ध्यान रहे की तुम्हारे पास सब कुछ हो पर कोई ऐसा न हो जिसके साथ तुम उसे बाँट सको, शेयर कर सको, कोई ह्रदय के इतना करीब नहीं की जिससे अपने सुख-दुःख, भाव आवेग बाँट सको, तो तुम उस कुँए के सामान हो जिसमें से कोई एक बाल्टी पानी निकलने वाला भी नहीं है । जल्दी ही तुम सड़ोगे, धीरे-धीरे तुम्हारे आनंद के स्रोत बंद हो जायेंगे, तुम एक गंदे पानी के डावरे हो कर रह जाओगे । निस्वार्थ मित्रता के संबंध तुम्हे तुम्हे जीवंत रखते हैं । तुम्हारे स्रोत खुले रहते हैं ।

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प्रेम का भ्रम

अगर साधारण मनुष्य के प्रेम का तुम विचार करो तो
बहुत चकित हो जाओगे!
उसके प्रेम में इतनी कीचड़ मिली
है, उसके सोने में इतना कचरा मिला है, कि सोना तो
एक प्रतिशत होगा, निन्यानबे प्रतिशत कचरा है। प्रेम
के नाम पर घृणा तक भीतर छिपी है।
तुमने यह बात गौर की? प्रेम को घृणा बनने में देर नहीं
लगती। मित्र को दुश्मन बनने में देर कितनी लगती है?
जिस स्त्री के लिए तुम जान देने को तैयार थे, उसी की
जान लेने को भी तैयार हो जाते हो-इसमें देर कितनी
लगती है?
प्रेम इतनी जल्दी घृणा बन जाता है? प्रेम घृणा बन
सकता है? और अगर प्रेम घ्रण बन सकता है तो कैसा प्रेम!
प्रेम घृणा नहीं बन सकता। फिर जो घृणा बन जाता है,
वह प्रेम था ही नहीं, कुछ और था, घृणा ही थी, प्रेम
का मुखोटा लगा कर नाटक कर रही थी। प्रेम के नाम
पर तुम शोषण कर रहे हो। प्रेम के नाम पर तुम एक-दूसरे का
उपयोग कर रहे हो। प्रेम के नाम पर तुम एक-दूसरे का
उपयोग कर रहे हो। प्रेम के नाम पर तुम एक-दूसरे की
मालकियत कर रहे हो। प्रेम के नाम पर राजनीति है,
कूटनीति है। प्रेम बड़ा लुभावना शब्द है, बड़ा प्यारा
शब्द है, खूब उलझा लेता है। जिससे भी तुम कह देते होः
मुझे आपसे बहुत प्रेम है, वही आपकी बातों में आ जाता
है। तुम्हें खुद से भी प्रेम नहीं है, तुम्हें और किस्से प्रेम
होगा? तुम कहते हो, हमें अपने बच्चों से प्रेम है। अपने
बच्चों से तुम्हें प्रेम नहीं है, अपने हैं, इसलिए प्रेम है। मेरे हैं,
अहंकार का हिस्सा हैं तुम्हारे, इसलिए प्रेम है। और अगर
तुम्हारा बेटा प्रधानमंत्री हो जाए, तो बहुत प्रेम पैदा
हो जाएगा। और तुम्हार बेटा अगर डाकू हो जाए और
कारागृह में चला जाए, तो तुम जाकर अदालत में
घोषणा कर दोगे कि मैं इनकार करता हूं कि यह मेरा
बेटा है। प्रेम समाप्त हो जाएगा।
तुम्हारा प्रेम भी अहंकार है। तुम्हारा प्रेम भी उतने ही
दूर तक है जहां तक तुम्हारे अहंकार को सहारा मिलता
है, सत्कार मिलता है, सम्मान मिलता है। इस प्रेम के
अनुभव के कारण लोगों को भी बात जंच जाती है कि
प्रेम पाप है। मगर यह तो प्रेम का अनुभव ही नहीं है।
कंकड़-पत्थर बीनते रहे और कहने लगे कि हीरे पाप हैं!
हीरों का तुम्हें अनुभव नहीं है।
प्रेम का थोडा अनुभव करो। प्रेम बड़ी अदभुत घटना है।
साधारण नहीं है, अलौकिक है। इस पृथ्वी पर स्वर्ग की
छोटी सी जो किरण उतरती है, उसी का नाम प्रेम है।
इस अंधेरे में रोशनी की जो थोड़ी सी झलक उतर आती
है, उसी का नाम प्रेम है। इस पथरीले हृदय में जो थोड़ी
आर्द्रता आ जाती है, उसी का नाम प्रेम है।

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ऊब

ऊबता प्रत्येक मनुष्य है,लेकिन उसकी ऊब दर्शन नहीँ बनती।
और ये सिलसिला जारी रहता है।
इतना ही फर्क है मनुष्य मे और किसी बुद्ध पुरुष मे कि मनुष्य एक स्त्री से ऊबता है,लेकिन दूसरी स्त्री मे रस बना रहता है।
जो पास है वह व्यर्थ हो जाता है,लेकिन जो दूर है वह सार्थक प्रतीत होता रहता है।वह भी कल प्राप्त कर लेने के बाद व्यर्थ हो जाएगा,लेकिन सभी तो पास आ नही जाता;कुछ तो दूर बना ही रहता है,इसीलिये वासना दौड़ती रहती है।
बुद्ध पुरुष के लिये एक घटना पर्याप्त है।
वे एक स्त्री से ऊब कर समस्त स्त्रियोँ से ऊब जाते हैँ,एक महल मे रहकर सब महलोँ से ऊब जाते हैँ।
“एक वासना की व्यवस्था को समझ कर सारी वासना को जो जान लेता है,वह बुद्धत्व को प्राप्त कर लेता है।
एक वासना को पहचान कर उसकी व्यर्थता को,उसकी अपरिहार्य असफलता को जो देख लेता है;उसकी वासना ऐसे गिर जाती है,जैसे लंगड़े की बैसाखियां अचानक गिर जाएं।
संसार मे चलने के कोई पैर थोड़े ही हैँ।
नकली पैर हैँ,वासनाओँ से निर्मित हैँ।
वासना के गिरते ही बैसाखियां गिर जाती हैँ और मनुष्य अचानक स्वयं को वहां पाता है जहां से वह कभी हटा नहीँ था।जहां वह सदा था।”

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ओशो के ११ स्वर्णिम सूत्र

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ओशो की वाणी में से कुछ बहुमूल्य चुनना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल भी। उनकी वाणी के अथाह सागर में से कुछ भी कहीं से भी ले लें, हर वाक्य ग्रंथ की तरह है। शशिकांत ‘सदैव’ बता रहे हैं, उनके 11 स्वर्णिम सूत्र, जिनको अपनाकर आप भी अपने व्यावहारिक जीवन को सफल बना सकते हैं:

अभी और यहीं

मनुष्य या तो अपने बीते हुए पलों में खोया रहता है या फिर अपने भविष्य की चिंताओं में डूबा रहता है। दोनों सूरतों में वह दुखी रहता है। ओशो कहते हैं कि वास्तविक जीवन वर्तमान में है। उसका संबंध किसी बीते हुए या आने वाले कल से नहीं है। जो वर्तमान में जीता है वही हमेशा खुश रहता है।

भागो नहीं, जागो

हम हमेशा अपने दुखों और जिम्मेदारियों से भागते रहते हैं, उनसे बचने के बहाने खोजते रहते हैं। अपनी गलतियों और कमियों के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराते रहते हैं, लेकिन ऐसा करके भी हम खुश नहीं रह पाते। ओशो कहते हैं कि परिस्थितियों से भागना नहीं चाहिए।

मैं नहीं, साक्षी भाव

मनुष्य के दुख का एक कारण यह भी है कि वह किसी भी चीज को, फिर वह इंसान हो या परिस्थिति, ज्यों का त्यों नहीं स्वीकारता। वह उसमें अपनी सोच अवश्य जोड़ देता है, जिसके कारण वह उसका हिस्सा बनने से चूक जाता है और दुखी हो जाता है। ओशो कहते हैं कि जो हो रहा है, उसे होने देना चाहिए, कोई अवरोध नहीं बनना चाहिए।

दमन, नहीं सृजन

मनुष्य सदा तनाव में रहता है। कभी ईर्ष्या से तो कभी क्रोध से भरा ही रहता है। उसमें भटकने और आक्रामक होने की संभावना हमेशा छुपी रहती है। वह चाहकर भी आनंदित और सुखी नहीं रह पाता। ओशो कहते हैं कि मनुष्य एक ऊर्जा है। हम यदि उस ऊर्जा को दबाएंगे तो वह कहीं न कहीं किसी और विराट रूप में प्रकट होगी ही।

शिकायत नहीं, धन्यवाद

ऐसा कौन है, जिसका मन शिकायतों से नहीं भरा! घर हो या दफ्तर, भगवान हो या संबंध, हम हमेशा सबसे शिकायत ही करते हैं। हमारी नजर हमेशा इस बात पर होती है कि हमें हमारे अनुसार क्या नहीं मिला। ओशो कहते हैं कि हमारी नजर सदा उस पर होनी चाहिए जो हमको मिला है।

ध्यान एकमात्र समाधान

अपनी इच्छाओं के पूरा होने के लिए लोग हमेशा से प्रार्थना, पूजा व कर्मकांड आदि को प्राथमिकता देते रहे हैं। ध्यान तो लोगों के लिए एक नीरस या उदास कर देने वाला काम है, तभी तो लोग पूछते हैं कि ध्यान करने से होगा क्या? ओशो ने ध्यान को जीवन में सबसे जरूरी बताया,यहां तक कि ध्यान को जीवन का आधार भी माना।

दूसरे को नहीं, खुद को बदलें

देखा जाए तो परोक्ष रूप से मनुष्य के तमाम दुखों और तकलीफों का आधार यह सोच रही है कि मेरे दुख का कारण सामने वाला है। हम परिस्थितियों या किस्मत के साथ भी यही रवैया रखते हैं कि वह बदलें हम नहीं।

अतिक्रमण नहीं, संतुलन

अति हर चीज की बुरी होती है। यह बात जानते हुए भी मनुष्य हर चीज की अति सुख को पाने या बनाए रखने के लिए करता है। ओशो कहते हैं सुख की चाह ही दुख की जड़ है। सुख अपने साथ दुख भी लाता है। ओशो कहते हैं न पाने का सुख हो, न खोने का दुख, यही अवस्था संन्यास की अवस्था है।

धर्म नहीं, धार्मिकता

मनुष्य ने अपनी पहचान को धर्म की पहचान से व्यक्त कर रखा है। कोई हिंदू है, कोई मुसलमान, कोई सिख तो कोई ईसाई। धर्म के नाम पर आपसी भेदभाव ही बढ़े हैं। नतीजा यह है कि आज धर्म पहले है मनुष्य और उसकी मनुष्यता बाद में। वह कहते हैं, आनंद मनुष्य का स्वभाव है और आनंद की कोई जाति नहीं उसका कोई धर्म नहीं।

सहें नहीं, स्वीकारें

बचपन से ही हमें सहना सिखाया जाता है। सहने को एक अच्छा गुण कहा जाता है। बरसों से यही दोहराया जाता रहा है कि यदि हर कोई सहनशील हो जाए तो न केवल व्यक्तिगत तौर पर बल्कि वैश्विक तौर पर धरती पर शांति हो सकती है, लेकिन आज परिणाम सामने है। ओशो बोध के पक्ष में हैं।

जीवन ही है प्रभु

ओशो कहते हैं कि आदमी बहुत अजीब है, वह इंसान की बनाई चीजों को तो मानता व पूजता है लेकिन स्वयं को, ईश्वर की बनाई सृष्टि और उसमें मौजूद प्रकृति की तरफ कभी भी आंख उठाकर नहीं देखता। सच यह है कि परमात्मा को मानने का मतलब ही हर चीज के लिए ‘हां’, पूर्ण स्वीकार भाव और यह जन्म जीवन उसका जीता-जागता सबूत है।

मित्रता

मित्रता! मित्रता वह प्रेम है जो बिना जैविक
कारणों से होता है। यह वैसी मित्रता नहीं है जैसा
कि तुम सामान्य रूप से समझते हो–प्रेमी या
प्रेमिका की तरह। यह जो शब्द–मित्रता है, उसे
किसी भी तरह यौनाकर्षण से संयुक्त कर देखना निरी
मूर्खता है। यह सम्मोहन और पागलपन है। जैविकता
प्रजनन के लिए तुम्हारा उपयोग कर रही है।
अगर तुम यह सोचते हो कि तुम प्रेम में हो, तो तुम
गलती में हो, यह केवल हार्मोन का आकर्षण है। तुम्हारे
शरीर का रसायन बदला जा सकता है और तुम्हारा
प्रेम नदारद हो जाएगा। हार्मोंस का केवल एक इंजेशन,
और पुरुष स्त्री बन सकता है और स्त्री पुरुष बन सकती है

मित्रता है बिना यौनाकर्षण का प्रेम। यह एक दुर्लभ
घटना बन गई है। अतीत में यह महत्वपूर्ण घटना रही है, पर
अतीत की कुछ महान अवधारणाएं बिलकुल खो गई हैं।
यह बहुत आश्चर्यजनक है कि कुरूप चीजें हमेशा जिद्दी
होती हैं,वे आसानी से नहीं मरतीं; और सुंदर चीजें बहुत
कोमल होती हैं, वे आसानी से मर जाती हैं और गुम हो
जाती हैं।
आज कल मित्रता को केवल यौनाकर्षण के संबंध में या
आर्थिक स्तर पर या सामाजिकता के तौर पर ही
समझा जाता है, वह महज परिचय है या जान-पहचान
है। मित्रता का मतलब है कि आवश्यकता पड़ने पर तुम
स्वयं का बलिदान करने को भी तत्पर हो । मित्रता
का मतलब है कि तुमने किसी अन्य व्यक्ति को स्वयं से
ज्यादा महत्वपूर्ण माना। यह व्यापार नहीं है। यह
अपने आप में पवित्र प्रेम है।
जिस तरह से तुम अभी हो, वैसे ही इस तरह की
मित्रता संभव है। अचेतन व्यक्ति भी इस तरह की
मित्रता रख सकते हैं। लेकिन जब तुम स्वयं के प्रति
ज्यादा सजग होने लगते हो तब मित्रता मैत्री में
बदलने लगती है। मैत्री का आशय ज्यादा व्यापक,
ज्यादा बडा आकाश है। मैत्री के मुकाबले मित्रता
छोटी चीज है। मित्रता टूट सकती है और मित्र शत्रु
बन सकता है। मित्रता में इस तरह की स्थिति बदलने
की संभावना हमेशा बनी रहती है।
इस संबंध में मुझे मैक्यावली का स्मरण होता है, जिसने
विश्व के राजकुमारों को मार्गदर्शन किया है उसकी
महान किताब ” दि प्रिन्स’ में। उनमे से एक परामर्श यह
था: ऐसी कोई बात अपने मित्र को मत बताओ जो
कि तुम अपने शत्रु को नहीं बता सकते क्योंकि वह
व्यक्ति जो आज मित्र है, कल शत्रु बन सकता है। और उन
परामर्शों में से एक परामर्श यह भी था कि अपने शत्रु के
संबंध में भी ऐसा मत बोलो, जो उसके विरोध में हो,
क्योंकि शत्रु भी कल मित्र बन सकता है। तब तुम्हारे
लिए स्थिति काफी अजीब होगी।
मैक्यावली की यह साफ अंतर्दृष्टि है कि हमारा
साधारण प्रेम नफरत में बदल सकता है, हमारी मित्रता
किसी भी क्षण शत्रुता में बदल सकती है। यह आदमी के
मन की अचेतन दशा है, यहां प्रेम के पीछे नफरत छिपी
होती है। यहां तुम उस व्यक्ति को भी घृणा करते हो,
जिनसे तुम्हें प्रेम है; पर इसके प्रति अभी तुम्हारी
सजगता नहीं है।
मैत्री केवल तब ही संभव बन सकती है जब तुम वास्तविक
और प्रामाणिक होते हो और जब तुम स्वयं के प्रति
पूर्ण रूप से सजग होते हो। और इस सजगता में से यदि प्रेम
निकलता है तो वह मैत्री है। और यह जो मैत्री है वह
कभी भी विपरीत में नहीं बदलती। ध्यान रहे, यह
कसौटी है, जीवन के महानतम मूल्य है केवल वे ही हैं जो
विपरीत में नहीं बदलते; सच तो यह है कि यहां कुछ भी
विपरीत नहीं है।

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