दुःख क्यों होता है ?

दुःख पैदा होता है क्योंकि हम बदलाव को होने नहीं
देते। हम पकड़ते हैं, हम चाहते हैं कि चीजें स्थिर हों। यदि
तुम स्त्री को प्रेम करते हो तो तुम उसे आने वाले कल भी
चाहते हो, वैसी ही जैसी कि वह तुम्हारे लिए आज है।
इस तरह से दुख पैदा होता है। कोई भी आने वाले क्षण के
लिए सुनिश्चित नहीं हो सकता–आने वाले कल कि
तो बात ही क्या करें?
होश से भरा व्यक्ति जानता है कि जीवन सतत बदल
रहा है। जीवन बदलाहट है। यहां एक ही चीज स्थायी
है, और वह है बदलाव। बदलाव के अलावा हर चीज
बदलती है। जीवन की इस प्रकृति को स्वीकारना, इस
बदलते अस्तित्व को उसके सभी मौसम और मूड के साथ
स्वीकारना, यह सतत प्रवाह जो एक क्षण के लिए भी
नहीं रुकता, आनंदपूर्ण है। तब कोई भी तुम्हारे आनंद को
विचलित नहीं कर सकता। स्थाई हो जाने की
तुम्हारी चाह तुम्हारे लिए तकलीफ पैदा करती है।
यदि तुम ऐसा जीवन जीना चाहते हो जिसमें कोई
बदलाव न हो–तुम असंभव बात करना चाहते हो।
होश से भरा व्यक्ति इतना साहसी होता है कि इस
बदलती घटना को स्वीकार लेता है। उस स्वीकार में
आनंद है। तब सब कुछ शुभ है। तब तुम कभी भी विषाद से नहीं भरते।

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प्रेम नहीं, नाटक

जैसे ही तुमने सुना ‘प्रेम’, कि तुमने जितनी फिल्में देखी हैं, उनका सबका सार आ गया। सबका निचोड़, इत्र। मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं वह कुछ और। मीरा ने किया, कबीर ने किया, नानक ने किया, जगजीवन ने किया। तुम्हारी फिल्मोंवाला प्रेम नहीं, नाटक नहीं। और जिन्होंने यह प्रेम किया उन सबने यहीं कहा कि वहां हार नहीं है, वहां जीत ही जीत है। वहां दुख नहीं है, वहां आनंद की पर्त पर पर्त खुलती चली जाती है। और अगर तुम इस प्रेम को न जान पाए तो जानना, जिंदगी व्यर्थ गई।

मरते वक्त अधिक लोगों की आंखों में यही भाव होता है। तरसते हुए जाते हैं। हां, कभी-कभी ऐसा घटता है कि कोई भक्त, कोई प्रेमी परमात्मा का तरसता हुआ नहीं जाता, लबालब जाता है। मैं किसी और प्रेम की बात कर रहा हूं। आंख खोलकर एक प्रेम होता है, वह रूप से है। आंख बंद करके एक प्रेम होता है, व अरूप से है। कुछ पा लेने की इच्छा से एक प्रेम होता है वह लोभ है, लिप्सा है। अपने को समर्पित कर देने का एक प्रेम होता है, वही भक्ति है।

तुम्हारा प्रेम तो शोषण है। पुरुष स्त्री को शोषित करना चाहता है, स्त्री पुरुष को शोषित करना चाहती है। इसीलिए तो स्त्री-पुरुषों के बीच सतत झगड़ा बना रहता है। पति-पत्नी लड़ते रहते हैं। उनके बीच एक कलह का शाश्वत वातावरण रहता है। कारण है क्योंकि दोनों एक-दूसरे को कितना शोषण कर लें, इसकी आकांक्षा है। कितना कम देना पड़े और कितना ज्यादा मिल जाए इसकी चेष्टा है। यह संबंध बाजार का है, व्यवसाय का है ।

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प्रश्न–एक पुरूष और एक स्त्री के बीच किस प्रकार का प्रेम संबंध की संभावना है, जो की सेडोमेसोकिज्म (पर-आत्मपीड़क) ढांचे में न उलझा हो?

ओशो— यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। धर्मों ने
इसे असंभव कर दिया है। स्त्री और पुरूष के
बीच कोई भी सुंदर संबंध—इसे नष्ट कर
दिया है। इसे नष्ट करने के पीछे कारण था।
यदि व्यक्ति का प्रेम जीवन परिपूर्ण है। तुम पुजा
स्थलों पर बहुत से लोगों को प्रार्थना करते हुए
नहीं पाओगे। वे प्रेम क्रीड़ा कर रहे
होंगे। कोई चिंता करता है उन मूर्खों की जो
धर्मस्थलों पर भाषण दे रहे है। यदि लोगों को प्रेम
जीवन पूर्णतया संतुष्ट और सुंदर हो वे
इसकी चिंता नहीं करेंगे कि परमात्मा है
या नहीं। धर्म ग्रंथ में पढ़ाई जाने वाली
शिक्षा सत्य है या नहीं। वे स्वयं से
पूरी तरह संतुष्ट होंगे। धर्मों ने तुम्हारे प्रेम
को विवाह बना कर नष्ट कर दिया है। विवाह अंत है।
प्रारंभ नहीं। प्रेम समाप्त हुआ। अब तुम एक पति
हो। तुम्हारी प्रेमिका तुम्हारी
पत्नी है। अब तुम एक दूसरे का दमन कर सकते
हो। यह एक राज निति हुई, यह तो प्रेम
नही हुआ। अब हर छोटी
सी बात विवाद का विषय बन जाती है।
और विवाह मनुष्य की प्रकृति के विरूद्ध है,
इसलिए देर-अबेर तुम इस स्त्री से ऊबने वाले हो।
और स्त्री तुमसे। और यह स्वाभाविक है। इसमें
कुछ भी गलत नहीं है।
इसीलिए मैं कहता हूं विवाह नहीं
होना चाहिए। क्योंकि विवाह पूरे विश्व को अनैतिक बनता है।
एक स्त्री के साथ सोता हुआ एक पुरूष, जो एक
दूसरे से प्रेम नहीं करते फिर भी प्रेम
क्रीड़ा करने का प्रयास कर रहे है। क्योंकि वे
विवाहित है—यह कुरूपता है। वीभत्स है।
इसे मैं वास्तविक वेश्या वृति कहता हूं। जब एक पुरूष वेश्या के
पास जाता है, कम से काम यह मामला सीधा तो
है। यह एक निश्चित वस्तु खरीद रहा है।
वह स्त्री को नहीं
खरीदता, वह एक वस्तु खरीद रहा
है। लेकिन उसने तो विवाह में पूरी
स्त्री ही खरीद
ली है। और उसके पूरे जीवन के लिए।
सभी पति और सभी पत्नियाँ बिना अपवाद के
पिंजरों में कैद है। इससे मुक्त होने के लिए छटपटा
रही है। यहां तक कि उन देशों में भी
जहां, जहां तलाक की अनुमति है। और वे अपने
भागीदार बदल सकते है। थोड़ों ही दिन
में उन्हें आश्चर्यजनक धक्का लगता है। दूसरा पुरूष अथवा
दूसरी स्त्री पहले वालों की
प्रतिलिपि निकलती है।

विवाह में स्थायित्व अप्राकृतिक है। एक संबंध में रहना
अप्राकृतिक है। मनुष्य प्रकृति से बहुत संबंधी
जीव है। और कोई भी
प्रतिभाशाली व्यक्ति बहु-संबंधी होगा।
कैसे हो सकता है। कि तुम इटालियन खाना ही
खाते चले जाओ। कभी-कभी तुम्हें
चाइनीज़ रेस्टोरेंट में भी जाना चाहोगे।
मैं चाहता हूं लोगे पुरी तरह विवाह और
विवाह के प्रमाण पत्रों से मुक्त हो जाए। उनके साथ रहने
का एक मात्र कारण होना चाहिए प्रेम, कानून
नहीं। प्रेम एक मात्र कानून होना चाहिए।
तब जो तुम पूछ रहे हो संभव हो सकता है। जिस क्षण
प्रेम विदा होता है। एक दूसरे को अलविदा कह दो। विवाह
के लिए कुछ नहीं है। प्रेम अस्तित्व का एक
उपहार था। वह पवन के झोंके की भांति आया, और
हवा की तरह चला गया। तुम एक दूसरे के
आभारी होगे। तुम विदा हो सकते हो। लेकिन तुम
उन सुंदर क्षणों को स्मरण करोगे जब तुम साथ थे। यदि
प्रेमी नही, तो तुम मित्र होकर रह
सकते हो। साधारणतया जब प्रेमी जुदा होते है वे
शत्रु हो जाते है। वास्तव में विदा होने से पहले
ही वे शत्रु हो जाते है—इसीलिए वे
जुदा हो रहे है।

अंतत: यदि दोनों व्यक्ति ध्यानी है, न कि
प्रेमी इस प्रयास में कि प्रेम की ऊर्जा एक
ध्यान मय स्थिति में परिवर्तित हो जाए—और यही
मेरी देशना है। एक पुरूष और एक स्त्री
के संबंध में। यह एक प्रगाढ़ ऊर्जा है। यह
जीवन है। यदि प्रेम क्रीड़ा करते समय,
तुम दोनों एक मौन अंतराल में प्रवेश कर सको। नितांत मौन स्थल में,
तुम्हारे मन में कोई विचार नहीं उठता। मानों समय
रूक गया हो। तब तुम पहली बार जानोंगे कि प्रेम
क्या है। इस भांति का प्रेम संपूर्ण जीवन चल सकता
है। क्योंकि यह कोई जैविक आकर्षण नहीं है
जो देर-अबेर समाप्त हो जाए। अब तुम्हारे सामने एक नया
आयाम खुल रहा है।

तुम्हारी स्त्री तुम्हारा मंदिर हो गई
है। तुम्हारा पुरूष तुम्हारा मंदिर हो गया है। अब
तुम्हारा प्रेम ध्यान हुआ। और यह ध्यान विकसित होता
जाएगा। और जि यह विकसित होगा तुम और-और आनंदित
होने लगोगे। और अधिक संतुष्ट और अधिक सशक्त। कोई संबंध
नहीं, साथ रहने का कोई बंधन
नहीं। लेकिन आनंद का परित्याग कौन कर सकता
है। कौन माँगेगा तलाक जब इतना आनंद हो? लोग तलाक
इसीलिए मांग रहे है क्योंकि कोई आनंद
नहीं है। मात्र संताप है और चौबीसों
घंटे एक दुःख स्वप्न।
यहां और विश्व भर में लोग सीख रहे कि प्रेम
ही एक स्थान है जहां से छलांग ली
जा सकती है। इसके आगे और भी
बहुत कुछ है, जो तभी संभव है तब दो व्यक्ति
अंतरंगता में एक लंबे समय तक रह सकते है। एक नये
व्यक्ति के साथ तुम पुन: प्रारंभ से शुरू करते हो। और नए
व्यक्ति की आवश्यकता नहीं है।
क्योंकि अब यह व्यक्ति का जैविक अथवा शारीरिक तल
न रहा, बल्कि तुम एक अध्यात्मिक मिलन में हो। कामवासना को
आध्यात्मिक में परिवर्तित करना ही मेरा मूल प्रयास
है। और यदि दोनों व्यक्ति प्रेमी ओर
ध्यानी है, तब वे इसकी परवाह
नहीं करेंगे कि कभी-कभी
वह चाइनीज़ रेस्टोरेंट में चला जाए और दूसरा
कंटीनैंटल रेस्टोरेंट में। इसमे कोई समस्या
नहीं है। तुम इस स्त्री से प्रेम
है। यदि कभी वह किसी और के साथ
आनंदित होती है, इसमें गलत क्या है?
तुम्हें खुश होना चाहिए कि यह प्रसन्न है, क्योंकि तुम
उससे प्रेम करते हो, केवल ध्यानी ही
ईर्ष्या से मुक्त हो सकता है।

एक प्रेमी बनो—यह एक शुभ प्रारंभ है लेकिन
अंत नहीं, अधिक और अधिक ध्यान मय होने में
शक्ति लगाओ। और शीध्रता करो, क्योंकि संभावना है
कि तुम्हारा प्रेम तुम्हारे हनीमून पर
ही समाप्त हो जाए। इसलिए ध्यान और प्रेम
हाथ में हाथ लिए चलने चाहिए। यदि हम ऐसे जगत का
निर्माण कर सकें जहां प्रेमी ध्यानी
भी हो। तब प्रताड़ना, दोषारोपण, ईष्र्या, हर संभव
मार्ग से एक दूसरे को चोट पहुंचाने की एक
लंबी शृंखला समाप्त हो जाएगी।
और जब मैं कहता हूं प्रेम हमारी स्वतंत्रता
होनी चाहिए। वे सारे जगत में मेरी निंदा
करते है। एक ‘सेक्स गुरू’ की भांति। निश्चित
ही में प्रेम की स्वतंत्रता का
पक्षपाती हूं। और एक भांति वे ठीक
भी है। मैं नहीं चाहता कि प्रेम बाजार
में मिलने वाली एक वस्तु हो। यह मात्र उन दो लोगों
के बीच मुक्त रूप से उपलब्ध होनी
चाहिए। जो राज़ी है। इतना ही
पर्याप्त है। और यह करार इसी क्षण के लिए
है। भविष्य के लिए कोई वादा नहीं है। इतना
ही पर्याप्त है। और तुम्हारी
गर्दन की ज़ंजीरें बन जायेगी।
वे तुम्हारी हत्या कर देंगी। भविष्य के
कोई वादे नही, इसी क्षण का आनंद लो।
और यदि अगले क्षण भी तुम साथ रहे तो तुम इसका
और भी आनंद लो। और यदि अगले क्षण तुम साथ
रह सके तुम और भी आनंद ले पाओगे।
तुम संबद्ध हो सकते हो। इसे एक संबंध मत बनाओ। यदि
तुम्हारी संबद्धता संपूर्ण जीवन चले,
अच्छा है। यदि न चले, वह और भी अच्छा है।
संभवत: यह उचित साथी न था शुभ हुआ कि तुम
विदा हुए। दूसरा साथ खोजों। कोई न कोई कहीं न
कहीं होगा जो तुम्हारी
प्रतीक्षा कर रहा है। लेकिन यह समाज
तुम्हें उसे खोजने की अनुमति नहीं देता
है। जो तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा
है। जो तुम्हारे अनुरूप है।
वे मुझे अनैतिक कहेंगे…..मेरे लिए यही नैतिकता
है। जिसे वे प्रचलन में लाने का प्रयास कर रहे है वह

अनैतिक है।

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“कीर्ति “

अगर स्त्री में भी परमात्मा की झलक पानी हो तो वो कहाँ पायी जा सकेगी , “कीर्ति “में , और “कीर्ति “का स्त्री से क्या सम्बन्ध है और “कीर्ति” क्या है ,

स्त्री को हम जब भी देखते है , खासकर आज के युग में जब भी स्त्री को हम देखते है तो स्त्री दिखाई नहीं पड़ती , सिर्फ वासना दिखाई पड़ती है , स्त्री को हम देखते ही एक वासना के विषय की तरह , एक ऑब्जेक्ट की तरह , स्त्री को हम देखते ही ऐसे है जैसे बस भोग्य है, जैसे उसका अपना कोई अर्थ अपना कोई अस्तित्व नहीं , और स्त्री को भी निरंतर एक ही ख्याल बना रहता है, वो भोग्य होने का उसका चलना , उसका उठना , उसका बैठना , उसके वस्त्र सब जैसे पुरुष की वासना को उद्दिपीत करने के लिए चुने जाते है,

चाहे स्त्री को इस बात की सचेतनता भी न हो consiousness भी न हो के वो जिन कपड़ो को पहन कर रास्ते पर निकली है वो धक्के खाने का आमन्त्रण भी है, शायद धक्का खाके,छेड़े जाने वो नाराज भी हो , शायद वो चीख पुकार भी मचाये , शायद रोष भी जाहिर करे लेकिन उसे ख्याल न आये कि इसमें उसका भी इतना ही हाथ है जितना धक्का मारने वाले का है ,

उसके वस्त्र उसका ढंग , उसके शरीर को सजाने और श्रृंगार की व्यवस्था अपने लिए नहीं मालूम पड़ती किसी और के लिए मालूम पड़ती है, इसलिए उसी स्त्री को घर में देखे उसके पति के सामने तब उसे देखकर विराग पैदा होगा , उसी स्त्री को भीड़ में देखें, तब उसे देखकर राग पैदा होगा , पति इसीलिए तो विरक्त हो जाते है , स्त्रीया उनको जिस रूप में दिखाई देती हैं, कम से कम उनकी स्त्रीया , पडोसी की स्त्रीयों में आकर्षण बना रहता है….
लेकिन जब स्त्री भीड़ में निकलती है तब उसकी दृष्टिकोण स्वयं को कामवासना का विषय मानकर चलने का होता है और दुसरे पुरुष भी उसको यही मानकर चलते है ।

“कीर्ति ” का अर्थ है जिस स्त्री में ऐसी दृष्टि न हो , जिसको अंग्रेजी में कहते है “ऑनर”, जिसे उर्दू में कहते है “इज्जत” ,
” कीर्ति ” का अर्थ है ऐसी स्त्री जो अपने को वासना का विषय मानकर नहीं जीती , जिसके व्यक्तित्व से वासना की झंकार नहीं निकलती तब स्त्री को एक अनूठा सौन्दर्य उपलब्ध होता है वो सौंदर्य उसकी “कीर्ति ” है उसका यश है | आज वैसी स्त्री को खोजना बहुत मुश्किल पड़ेगा ,

कीर्ति एक आंतरिक गुण है , एक भीतरी सौन्दर्य , उस सौन्दर्य का नाम कीर्ति है जिसे देखकर वासना शांत हो उभरे नहीं , ये थोडा कठिन मामला है, लेकिन एक बात हम समझ सकते है अगर स्त्री वासना को उभार सकती है तो शांत क्यों नहीं कर सकती जो भी उभार करने वाला बन सकता है, वो शांत करने वाला शामक भी बन सकता है ।

अगर स्त्री अपने ढंगों से वासना को उत्तेजित करती है, प्रज्वलित करती है, तो अपने ढंगों से उस शांत भी कर दे सकती है , वो जो शांत कर देने वाला सौन्दर्य है कि दूसरा व्यक्ति वासनातुर हो कर भी आ रहा हो, विक्षिप्त होकर भी आ रहा हो तो स्त्री की आँखों से उस सौन्दर्य का जो दर्शन है , उसके व्यक्तित्व से उसकी जो छाया और झलक है जो उसकी वासना पर पानी डाल दे , और आग बुझ जाए उसका नाम ” कीर्ति ” है

“कीर्ति ” स्त्री के भीतर उस गुणवत्ता का नाम है जहाँ वासना पर पानी गिर जाता है , कीर्ति का अर्थ हुआ कि जिस स्त्री के पास बैठकर आपकी वासना तिरोहित हो जाए , इसलिए हमने माँ को इतना मूल्य दिया , कीर्ति के कारण माँ को हमने इतना मूल्य दिया , मातृत्व को इतना मूल्य दिया , पुराने ऋषियो ने आशीर्वाद दिए है बड़े अजीब आशीर्वाद कि दस तेरे पुत्र हो और अंत में तेरा पति तेरा ग्यारहवा पुत्र हो जाए और जब तक पति ही तेरा पुत्र न जाए तू जानना कि तूने स्त्री की परम गरिमा प्राप्त नहीं की , पति पुत्र हो जाए जिस आंतरिक गुण से जिस धर्म से उसका नाम “कीर्ति ” है |

कृष्ण कहते है स्त्रिओ में मैं “कीर्ति” ….
निश्चित ही बहुत दुर्लभ गुण है खोजना बहुत मुश्किल है , अभिनेताओं और अभिनेत्रियो के जगत में ” कीर्ति ” को खोजना बिलकुल मुश्किल है और मंच पर जो अभिनय कर रहे है वो तो कम् अभिनेता है उनकी नक़ल करने वाला जो बड़ा समाज है , इमीटेशन का वो सड़क पर चौराहों पर अभिनय कर रहे है

इस सदी में अगर सर्वाधिक किसी के गुणों को चोट पहुंची है तो वो स्त्री है क्योंकि उसके किन गुणों का मूल्य है उसकी धारणा ही खो गयी है

“कीर्ति” का हम कभी सोचते भी नहीं होगे आप बाप होगे आपके घर में लड़की होगी आप ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि इस लड़की के जीवन में कभी कीर्ति का जन्म हो, आपने लड़की को जन्म दे दिया और आप उसमें अगर कीर्ति का जन्म नहीं दे पाए तो आप बाप नहीं है सिर्फ एक मशीन है उत्पादन की , लेकिन कीर्ति बड़ी कठिन बात है और गहरी साधना से ही उपलब्ध हो सकती है

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जब किसी पुरुष में वासना तिरोहित होती है तो ब्रहमचर्य फलित होता है और जब किसी स्त्री में वासना तिरोहित होती है तो” कीर्ति “फलित होती है , “कीर्ति” काउंटर पार्ट है , स्त्री में कीर्ति का फूल लगता है फल लगता है जैसे पुरुष में ब्रहमचर्य का फूल लगता है ।

दुनिया में दो ही दुख हैं

जॉर्ज बर्नाड शॉ ने कहा है, दुनिया में दो ही दुख हैं- एक तुम जो चाहो वह न मिले और दूसरा तुम जो चाहो वह मिल जाए। और दूसरा दुख मैं कहता हूं कि पहले से बड़ा है।

जिनके प्रेम सफल हो गए हैं, उनके प्रेम भी असफल हो जाते हैं। इस संसार में कोई भी चीज सफल हो ही नहीं सकती। बाहर की सभी यात्राएं असफल होने को आबद्ध हैं। क्यों? क्योंकि जिसको तुम तलाश रहे हो बाहर, वह भीतर मौजूद है। इसलिए बाहर तुम्हें दिखाई पड़ता है और जब तुम पास पहुंचते हो, खो जाता है। मृग-मरीचिका है। दूर से दिखाई पड़ता है।

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दुनिया का तमाशा

बुद्ध को एक सभा में भाषण
करना था । जब समय
हो गया तो बुद्ध आए और बिना कुछ
बोले ही वहाँ से चल गए । तकरीबन एक
सौ पचास के करीब श्रोता थे । दूसरे
दिन तकरीबन सौ लोग थे पर फिर
उन्होंने ऐसा ही किया बिना बोले
चले गए ।इस बार पचास कम हो गए ।
तीसरा दिन हुआ साठ के करीब लोग
थे महात्मा बुद्ध आए, इधर – उधर
देखा और बिना कुछ कहे वापिस चले
गए । चौथा दिन हुआ तो कुछ लोग
और कम हो गए तब भी नहीं बोले । जब
पांचवां दिन हुआ तो देखा सिर्फ़
चौदह लोग थे । महात्मा बुद्ध उस दिन
बोले और चौदोहों लोग उनके साथ
हो गए ।
किसी ने महात्मा बुद्ध
को पूछा आपने चार दिन कुछ
नहीं बोला । इसका क्या कारण
था । तब बुद्ध ने कहा मुझे भीड़
नहीं काम करने वाले चाहिए थे ।
यहाँ वो ही टिक सकेगा जिसमें धैर्य
हो । जिसमें धैर्य था वो रह गए।
केवल भीड़ ज्यादा होने से कोई
नहीं फैलता है । समझने वाले चाहिए,
तमाशा देखने वाले रोज इधर – उधर
ताक-झाक करते है । समझने
वाला धीरज रखता है । कई
लोगों को दुनिया का तमाशा अच्छा
लगता है । समझने वाला शायद
हजार में एक
ही हो ऐसा ही देखा जाता है

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दुःख क्यों होता है ?

दुःख पैदा होता है क्योंकि हम बदलाव को होने नहीं देते। हम पकड़ते हैं, हम चाहते हैं कि चीजें स्थिर हों। यदि तुम स्त्री को प्रेम करते हो तो तुम उसे आने वाले कल भी चाहते हो, वैसी ही जैसी कि वह तुम्हारे लिए आज है। इस तरह से दुख पैदा होता है। कोई भी आने वाले क्षण के लिए सुनिश्चित नहीं हो सकता–आने वाले कल कि तो बात ही क्या करें?

होश से भरा व्यक्ति जानता है कि जीवन सतत बदल रहा है। जीवन बदलाहट है। यहां एक ही चीज स्थायी है, और वह है बदलाव। बदलाव के अलावा हर चीज बदलती है। जीवन की इस प्रकृति को स्वीकारना, इस बदलते अस्तित्व को उसके सभी मौसम और मूड के साथ स्वीकारना, यह सतत प्रवाह जो एक क्षण के लिए भी नहीं रुकता, आनंदपूर्ण है। तब कोई भी तुम्हारे आनंद को विचलित नहीं कर सकता। स्थाई हो जाने की तुम्हारी चाह तुम्हारे लिए तकलीफ पैदा करती है। यदि तुम ऐसा जीवन जीना चाहते हो जिसमें कोई बदलाव न हो–तुम असंभव बात करना चाहते हो।

होश से भरा व्यक्ति इतना साहसी होता है कि इस बदलती घटना को स्वीकार लेता है। उस स्वीकार में आनंद है। तब सब कुछ शुभ है। तब तुम कभी भी विषाद से नहीं भरते।

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जो प्रेम को उपलब्ध होता है, वह भय से मुक्त हो जाता है

” जो प्रेम को उपलब्ध होता है, वह भय से मुक्त हो जाता है। ” ~ ओशो : –

” एक युवक अपनी नववधु के साथ समुद्र-यात्रा पर था। सूर्यास्त हुआ, रात्रि का घना अंधकार छा गयाऔर फिर एकाएक जोरों का तूफान उठा। यात्री भय से व्याकुल हो उठे। प्राण संकट में थे और जहाज अब डूबा, तब डूबा होने लगा। किंतु वह युवक जरा भी नहीं घबड़ाया।

उसकी पत्नी ने आकुलता से पूछा, ‘तुम निश्चिंत क्यों बैठे हो? देखते नहीं कि जीवन बचने की संभावना क्षीण होती जा रही है! ‘उस युवक ने अपनी म्यान से तलवार निकाली और पत्नी की गर्दन पर रखकर कहा, ‘क्या तुम्हें डर लगता है?’

वह युवती हँसने लगी और बोली, ‘तुमने यह कैसा ढोंग रचा? तुम्हारे हाथ में तलवार हो, तो भय कैसा!’ वह युवक बोला, ‘परमात्मा के होने की जब से मुझे गंध मिली है, तब से ऐसा ही भाव मेरा उसके प्रति भी है, तो भय रह ही नहीं जाता है।’

प्रेम अभय है। अप्रेम भय है। जिसे भय से ऊपर उठना हो, उसे समस्त के प्रति प्रेम से भर जाना होगा। चेतना के इस द्वार से प्रेम भीतर आता है, तो उस द्वार से भय बाहर हो जाता है। ”

Safar

सच्चा प्रेम

प्रेम स्थायी या अनंत नहींहै। ध्यान रहे,
कवि जो कहते हैं वह सत्य नहींहै। उनकी
कसौटियों को मत लो कि सच्चा प्रेम अनंत
होताहै, और गैर सच्चा प्रेम क्षणिक
होताहै–नहीं! इसके ठीक विपरीत बातहै।
सच्चा प्रेम बहुत क्षणिक होताहै–लेकिन वह
क्षण ऐसा होताहै …ऐसा कि कोई उसके लिए
अनंतकाल को छोड़ सकताहै, इसके लिए सारे
अनंत काल को दांव पर लगा सकताहै। उस क्षण
को स्थायी कौन चाहताहै? और स्थायीत्व
इतना क्यों महत्वपूर्ण होना
चाहिए?…चूंकि जीवन बदलावहै, प्रवाहहै;
सिर्फ मृत्यु स्थायी होतीहै।

vijay

अपेक्षाएं

दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करना बंद करो, क्योंकि यह एक मात्र ढंग है जिससे तुमआत्महत्या कर सकते हो। तुम यहां किसी की भी अपेक्षाएं पूरी करने के लिए नहीं हो और कोई भी यहां तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करने के लिए नहीं हैं। दूसरों की अपेक्षाओं के कभी भी शिकार मत बनो और किसी दूसरे को अपनी अपेक्षाओं का शिकार मत बनाओ।यही है जिसे मैं निजता कहता हूं। अपनी निजता का सम्मान करो और दूसरों की निजता का भी सम्मान करो। कभी भी किसी के जीवन में हस्तक्षेप मत करो और किसी को भी अपनेजीवन में हस्तक्षेप मत करने दो। सिर्फ तब ही एक दिन तुम आध्यात्मिकता में विकसितहो सकते हो।वर्ना, नन्यानबे प्रतिशत लोग आत्महत्या करते हैं। उनका सारा जीवन और कुछ नहीं बस धीमी गति से आत्महत्या है। यह अपेक्षा और वह अपेक्षा पूरी करते हुए…किसी दिन पिता, किसी दिन माता, किसी दिन पत्नी, पति, फिर बच्चे आते हैं–वे अपेक्षाएं करते हैं। फिर समाज आ जाता है, पंडित और राजनेता। चारों तरफ सभी अपेक्षाएं कर रहेहैं। और तुम बेचारे वहां हो, बस बेचारे मनुष्य–और सारी दुनिया तुमसे अपेक्षा कर रही है कि यह करो और वह करो। और तुम दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते, क्योंकि वे बड़ी विरोधाभासी हैं।तुम दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करते हुए पागल हो गए हो। और तुमने किसी की भी अपेक्षा पूरी नहीं की है। कोई भी प्रसन्न नहीं है। तुम हार गए, नष्ट हो गए और कोईभी प्रसन्न नहीं है। जो लोग स्वयं के साथ खुश नहीं हैं वे प्रसन्न नहीं हो सकते।तुम कुछ भी कर लो, वे तुम्हारे साथ अप्रसन्न होने के मार्ग ढूंढ़ लेंगे, क्योंकि वे प्रसन्न नहीं हो सकते।प्रसन्नता एक कला है जो तुम्हें सीखनी होती है। इसका तुम्हारे करने या न करने सेकुछ लेना देना नहीं है।सुखी करने की जगह, प्रसन्न होने की कला सीखो।

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