नारी जो चाहे वो कराये

एक गांव में एक जमींदार था। उसके कई नौकरों में जग्गू भी था। गांव से लगी बस्ती में, बाकी मजदूरों के साथ जग्गू भी अपने पांच लड़कों के साथ रहता था। जग्गू की पत्नी बहुत पहले गुजर गई थी। एक झोंपड़े में वह बच्चों को पाल रहा था। बच्चे बड़े होते गये और जमींदार के घर नौकरी में लगते गये।
सब मजदूरों को शाम को मजूरी मिलती। जग्गू और उसके लड़के चना और गुड़ लेते थे। चना भून कर गुड़ के साथ खा लेते थे।
बस्ती वालों ने जग्गू को बड़े लड़के की शादी कर देने की सलाह दी। उसकी शादी हो गई और कुछ दिन बाद गौना भी आ गया। उस दिन जग्गू की झोंपड़ी के सामने बड़ी बमचक मची। बहुत लोग इकठ्ठा हुये नई बहू देखने को। फिर धीरे धीरे भीड़ छंटी। आदमी काम पर चले गये। औरतें अपने अपने घर। जाते जाते एक बुढ़िया बहू से कहती गई – पास ही घर है। किसी चीज की जरूरत हो तो संकोच मत करना, आ जाना लेने। सबके जाने के बाद बहू ने घूंघट उठा कर अपनी ससुराल को देखा तो उसका कलेजा मुंह को आ गया। जर्जर सी झोंपड़ी, खूंटी पर टंगी कुछ पोटलियां और झोंपड़ी के बाहर बने छ चूल्हे (जग्गू और उसके सभी बच्चे अलग अलग चना भूनते थे)। बहू का मन हुआ कि उठे और सरपट अपने गांव भाग चले। पर अचानक उसे सोच कर धचका लगा – वहां कौन से नूर गड़े हैं। मां है नहीं। भाई भौजाई के राज में नौकरानी जैसी जिंदगी ही तो गुजारनी होगी। यह सोचते हुये वह बुक्का फाड़ रोने लगी। रोते रोते थक कर शान्त हुई। मन में कुछ सोचा। पड़ोसन के घर जा कर पूछा – अम्मां एक झाड़ू मिलेगा? बुढ़िया अम्मा ने झाड़ू, गोबर और मिट्टी दी। साथ में अपनी पोती को भेज दिया। जग्गू और उसके लड़के जब लौटे तो एक ही चूल्हा देख भड़क गये। चिल्लाने लगे कि इसने तो आते ही सत्यानास कर दिया। अपने आदमी का छोड़ बाकी सब का चूल्हा फोड़ दिया। झगड़े की आवाज सुन बहू झोंपड़ी से निकली। बोली – आप लोग हाथ मुंह धो कर बैठिये, मैं खाना निकालती हूं। सब अचकचा गये! हाथ मुंह धो कर बैठे। बहू ने पत्तल पर खाना परोसा – रोटी, साग, चटनी। मुद्दत बाद उन्हें ऐसा खाना मिला था। खा कर अपनी अपनी कथरी ले वे सोने चले गये।
सुबह काम पर जाते समय बहू ने उन्हें एक एक रोटी और गुड़ दिया। चलते समय जग्गू से उसने पूछा – बाबूजी, मालिक आप लोगों को चना और गुड़ ही देता है क्या? जग्गू ने बताया कि मिलता तो सभी अन्न है पर वे चना-गुड़ ही लेते हैं। आसान रहता है खाने में। बहू ने समझाया कि सब अलग अलग प्रकार का अनाज लिया करें। देवर ने बताया कि उसका काम लकड़ी चीरना है। बहू ने उसे घर के ईंधन के लिये भी कुछ लकड़ी लाने को कहा।
बहू सब की मजूरी के अनाज से एक एक मुठ्ठी अन्न अलग रखती। उससे बनिये की दुकान से बाकी जरूरत की चीजें लाती। जग्गू की गृहस्थी धड़ल्ले से चल पड़ी। एक दिन सभी भाइयों और बाप ने तालाब की मिट्टी से झोंपड़ी के आगे बाड़ बनाया। बहू के गुण गांव में चर्चित होने लगे।
जमींदार तक यह बात पंहुची। वह कभी कभी बस्ती में आया करता था। आज वह जग्गू के घर उसकी बहू को आशीर्वाद देने आया। बहू ने पैर छू प्रणाम किया तो जमींदार ने उसे एक हार दिया। हार माथे से लगा बहू ने कहा कि मालिक यह हमारे किस काम आयेगा। इससे अच्छा होता कि मालिक हमें चार लाठी जमीन दिये होते झोंपड़ी के दायें बायें, तो एक कोठरी बन जाती। बहू की चतुराई पर जमींदार हंस पड़ा। बोला – ठीक, जमीन तो जग्गू को मिलेगी ही। यह हार तो तुम्हारा हुआ।
यह कहानी मेरी दादी मुझे सुनाती थीं। फिर हमें सीख देती थीं – औरत चाहे घर को स्वर्ग बना दे, चाहे नर्क! मुझे लगता है कि देश, समाज, और आदमी को औरत ही गढ़ती है।

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हर हाल में राजी

शिष्य ने गुरु से कहा ~ गुरूदेव ! एक व्यक्ति ने आश्रम के लिए गाय भेंट की है !

गुरू ने कहा ~ अच्छा हुआ दुध पीने को मिलेंगा !

एक सप्ताह बाद शिष्य ने आकर गुरू से कहा ~ गुरूजी ! जिस व्यक्ति ने गाय दी थी आज वह अपनी गाय वापस ले गया ।

गुरू ने कहा ~ अच्छा हुआ ! गोबर उठाने की झझंट से मुक्ती मिली ।

ऐसा व्यक्ती जो हर हाल में राजी हो , उसे कोई दुःख कभी दु:खी नही कर सकता ! परिस्थिती बदले तो मन:स्थिति बदल लो , बस दुख सुख में बदल जाएंगा । सुख – दुःख कुछ नही , दोनो मन के ही तो समीकरण है ।

प्रेम मार्ग है , प्रेम द्वार है , प्रेम पैरों की शक्ति है , प्रेम प्राणों की प्यास है । अंततः प्रेम ही प्राप्ती है । वास्तव में प्रेम ही परमात्मा है । मैं कहता हूँ परमात्मा को छोडो प्रेम को पाओ , मंदिरों को भुलो हृदय को खोजो ; क्योंकि वह है तो वही है ।

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तुम अकेले हो

तुम्हें इस सत्य को स्वीकारना होगा कि तुम अकेले हो–हो सकताहै कि तुम भीड़ में होओ, पर तुम अकेले जी रहे हो; हो सकताहै कि अपनी पत्नी के साथ, गर्लफ्रेँड के साथ, ब्वॉयफ्रेँड के साथ, लेकिन वे अपने अकेलेपन के साथ अकेले हैं, तुम अपने अकेलेपन के साथ अकेले हो, और ये अकेलेपन एक-दूसरे को छूते भी नहीं हैं, एक-दूसरे को कभी भी नहीं छूते हैं।

हो सकताहै कि तुम किसी के साथ बीस साल, तीस साल, पचास साल रहते हो–इससे कोई फर्क नहीं पड़ताहै, तुम अजनबी बने रहोगे। हमेशा और हमेशा तुम अजनबी होओगे। इस तथ्य को स्वीकारो कि हम यहां पर अजनबी हैं; कि हम नहीं जानते कि तुम कौन हो, कि हम नहीं जानते कि मैं कौन हूं। मैं स्वयं नहीं जानता कि मैं कौन हूं, तो तुम कैसे जान सकते हो? लेकिन लोग अनुमान लगाते हैं कि पत्नी ने पति को जानना चाहिए, पति यह अनुमान लगाताहै कि पत्नी को पति ने जानना चाहिए। सभी इस तरह से बरताव कर रहे हैं जैसे कि सभी को मन को पढ़ने वाला होना चाहिए, और इसके पहले कि तुम कहो, तुम्हारी जरूरत को, तुम्हारी समस्याओं को उससे जानना चाहिए। उसे जानना चाहिए–और उन्हें कुछ करना चाहिए। अब यह सारी बातें नासमझी हैं।

तुम्हें कोई नहीं जानता, तुम भी नहीं जानते, इसलिए अपेक्षा मत करो कि सभी को तुम्हें जानना चाहिए; चीजों की प्रकृति के अनुसार यह संभव नहींहै। हम अजनबी हैं। शायद संयोगवश हम साथ हैं, लेकिन हमारा अकेलापन होगा ही। इसे मत भूलो, क्योंकि तुम्हें इसके ऊपर कार्य करना होगा। सिर्फ वहां से तुम्हारी मुक्ति, तुम्हारा मोक्ष संभवहै। लेकिन तुम इससे ठीक उल्टा कर रहे हो : कैसे अपने अकेलेपन को भूलो? ब्वॉयफ्रेँड, गर्लफ्रेँड, सिनेमा चले जाओ, फुटबाल मैच देखो; भीड़ में खो जाओ, डिस्को में नाचो, स्वयं को भूल जाओ, शराब पीओ, ड्रग्स ले लो, लेकिन किसी भी तरह से अपने अकेलेपन को, अपने सचेतन मन तक मत आने दो–और सारा रहस्य यहीं परहै। तुम्हें अपने अकेलेपन को स्वीकारना होगा, जिसे तुम किसी भी तरह से टाल नहीं सकते। और इसके स्वभाव को बदलने का कोई मार्ग नहींहै। यह प्रामाणिक वास्तविकताहै। यह तुम हो।

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जीवन

प्रशन:- भगवान, जीवन व्यर्थ क्यों
मालूम होता है?
ओशो:- जीवन व्यर्थ है, ऐसा मत कहो!
ऐसा कहो कि मेरे जीने के ढंग में क्या
कहीं कोई भूल थी? क्या कहीं कोई
भूल है कि मेरा जीवन व्यर्थ हुआ जा
रहा है?
जीवन तो कोरा कागज है; जो
लिखोगे वही पढोगे! गलियां लिख
सकते हो, गीत लिख सकते हो! और
गलियां भी उसी वर्णमाला से बनती है
जिससे गीत बनते है; वर्णमाला तो
निरपेक्ष है, निष्पक्ष है! जिस कागज पर
लिखते हो वह भी निरपेक्ष, निष्पक्ष!
जिस कलम से लिखते हो, वह भी
निरपेक्ष, वह भी निष्पक्ष! सब दांव
तुम्हारे हाथ है! तुमने इस ढंग से जीया
होगा, इसलिए व्यर्थ मालूम होता है!
तुम्हारे जीने में भूल है! और जीवन को
गाली मत देना!
यह बड़े मजे की बात है! लोग कहते है,
जीवन व्यर्थ है! यह नहीं कहते कि हमारे
जीने का ढंग व्यर्थ है! और तुम्हारे तुम्हारे
तथाकथित साधु-संत, महात्मा भी
तुमको यही समझाते है—-जीवन व्यर्थ
है!
मैं तुमसे कुछ और कहना चाहता हूं! मैं
कहना चाहता हूं: जीवन न तो सार्थक
है, न व्यर्थ; जीवन तो निष्पक्ष है;
जीवन तो कोरा आकाश है! उठाओं
तूलिका, भरो रंग! चाहो तो इंद्रधनुष
बनाओ और चाहो तो कीचड़ मचा दो!
कुशलता चाहिए! अगर जीवन व्यर्थ है
तो उसका अर्थ यह है कि तुमने जीवन
को जीने की कला नहीं सीखी;
उसका अर्थ है कि तुम यह मान कर चले थे
कि कोई जीवन में रेडीमेड अर्थ होगा!
जीवन कोई रेडीमेड कपडे नहीं है, कि गए
और तैयार कपडे मिल गए! जिंदगी से कपडे
बनाने पड़ते है! फिर जो बनाओगे वही
पहनना पड़ेगा, वाही ओढ़ना पड़ेगा!
और कोई दूसरा तुम्हारी जिंदगी में कुछ
भी नहीं कर सकता! कोई दूसरा तुम्हारे
कपडे नहीं बना सकता! जिंदगी के
मामले में तो अपने कपडे खुद ही बनाने

होते है!happiness

होते है!

सुकरात और आईना

दार्शनिक सुकरात दिखने में कुरुप थे। वह एक दिन अकेले बैठे हुए आईना हाथ मे लिए अपना चेहरा देख रहे थे।

तभी उनका एक शिष्य कमरे मे आया; सुकरात को आईना देखते हुए देख उसे कुछ अजीब लगा। वह कुछ बोला नही सिर्फ मुस्कराने लगा। विद्वान सुकरात शिष्य की मुस्कराहट देख कर सब समझ गए और कुछ देर बाद बोले, ”मैं तुम्हारे मुस्कराने का मतलब समझ रहा हूँ…….शायद तुम सोच रहे हो कि मुझ जैसा कुरुप आदमी आईना क्यों देख रहा है ?”
शिष्य कुछ नहीं बोला, उसका सिर शर्म से झुक गया।

सुकरात ने फिर बोलना शुरु किया , “शायद तुम नहीं जानते कि मैं आईना क्यों देखता हूँ”
“नहीं ”, शिष्य बोला ।

गुरु जी ने कहा “मैं कुरूप हूं इसलिए रोजाना आईना देखता हूं”। आईना देख कर मुझे अपनी कुरुपता का भान हो जाता है। मैं अपने रूप को जानता हूं। इसलिए मैं हर रोज कोशिश करता हूं कि अच्छे काम करुं ताकि मेरी यह कुरुपता ढक जाए।

शिष्य को ये बहुत शिक्षाप्रद लगी । परंतु उसने एक शंका प्रकट की- ” तब गुरू जी, इस तर्क के अनुसार सुंदर लोगों को तो आईना नही देखना चाहिए ?”

“ऐसी बात नही!” सुकरात समझाते हुए बोले, ” उन्हे भी आईना अवश्य देखना चाहिए”! इसलिए ताकि उन्हे ध्यॉन रहे कि वे जितने सुंदर दीखते हैं उतने ही सुंदर काम करें, कहीं बुरे काम उनकी सुंदरता को ढक ना ले और परिणामवश उन्हें कुरूप ना बना दे ।

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शिष्य को गुरु जी की बात का रहस्य मालूम हो गया। वह गुरु के आगे नतमस्तक हो गया। ओशो

प्रेम और रोमांस

केवल सेक्स, प्रेम और रोमांस के बारे में सोचना क्या गलत है?
कृष्णप्रिया-आप कहते है, अपने सारे मुखौटे हटा दो और
प्रमाणिक हो जाओ। मैं केवल सेक्स, प्रेम और रोमांस के बारे
में सोचती हूं, इनके अतिरिक्त और जानती नहीं हूं, क्या में
गलत रास्ते पर हूं?
ओशो – मुझे सेक्स में, कुछ में, रोमांस में कुछ भी गलत नहीं
दिखाई पड़ता। तुम ठीक रास्ते पर हो। प्रेम उचित पथ है, और
केवल प्रेम के जीवन को जीने के माध्यम से ही प्रार्थना
उठती है—और किसी भांति नहीं। प्रेम के गहरे, मीठे और
कड़वे, प्रसन्नतादायी और पीड़ादायक, ऊंचे और नीचे, स्वर्ग
और नरक, अनुभवों के माध्यम से ही, केवल प्रेम के माध्यम से
मिली पीड़ा और प्रसन्नता के गहन अनुभवों द्वारा ही
व्यक्ति सजग हो पाता है। तुमको सजग बनाने के लिए
उनकी आवश्यकता होती है।
पीड़ा की उतनी ही आवश्यकता है जितनी प्रसन्नता की
है, क्योंकि दोनों कार्य करती हैं। और धीरे— धीरे
प्रसन्नता और पीड़ा के मध्य में तुम रस्सी पर चलने वाले नट बन
जाते हो। तुम संतुलन उपलब्ध कर लेते हो।
लेकिन सदियों से प्रेम की निंदा की गई है, काम की निंदा
की गई है। इसलिए, निःसंदेह तुम्हारे मन में यह खयाल उठता
है कि तुमको गलत रास्ते पर होना चाहिए। तुम बस
प्राकृतिक हो। प्राकृतिक होना गलत रास्ते पर होना
नहीं है। यदि तुम इस ढंग से विचार करती हो तो तुम
निंदात्मक वृत्ति वाली हो जाती हो, और तब तुम गलत
रास्ते पर होगी। तब तुम दमन करोगी, और तुम जो कुछ भी
दमन करोगी वह तुम्हारे अचेतन में, तुम्हारे तलघर में छिप कर
बैठा रहेगा, और फिर उस दमन से बहुत सी कुरूपता उठ खड़ी
होती है।
मैं तुम्हें कुछ कहानियां सुनाता हूं।
एक बहुत धनी और विख्यात व्यक्ति लार्ड डयूसबरी के बारे
में ऐसा कहा गया है : उस समय वह नब्बे वर्ष का था, और वह
पार्क लेन के अपने आवास के भूतल पर खाड़ी की ओर खुलने
वाली खिड़की के सामने बैठा हुआ, रविवार की
प्रातःकाल भ्रमण करने वालों को देख रहा था। अचानक
उसने एक आकर्षक, युवा, गौरवर्ण लड़की को पार्क में बच्चा
—गाड़ी धकेलते हुए देखा। जल्दी करो जेम्स, वह बोला, मेरे
दांत ले लाओ; मैं सीटी मारना चाहता हूं।
नब्बे साल की आयु! लेकिन होता है यह।
यह प्रश्न कृष्णप्रिया ने पूछा है।
याद रखो, यदि तुमने सीटी अभी नहीं बजाई तो किसी
दिन जब तुम्हारे दांत भी गिर चुके होंगे और तुम किसी युवक
को टहलते हुए देखोगी और चिल्लाओगी : जल्दी करो मेरे
दांत ले आओ! कुरूप होगा यह। अभी इसी समय दांत ठीक—
ठाक हैं, तुम सीटी बजा सकती हो। प्रत्येक कार्य को उसके
समय पर ही किया जाना चाहिए। अन्यथा चीजें कुरूप हो
जाती हैं।
एक बच्चा तितलियों के पीछे दौड़ रहा है, यह ठीक है,
लेकिन चालीस वर्ष का कोई व्यक्ति यदि तितलियों के
पीछे दौड़ रहा हो तो वह पागल प्रतीत होगा, युवा
व्यक्तियों को थोड़ा सा मूर्ख होना अनिवार्य है। उसकी
व्यक्ति अपेक्षा रखता है और उसे स्वीकार भी करता है।
कुछ भी गलत नहीं है इसमें। इसको जीवन का आधार तथ्य
होना चाहिए : किन्हीं समयों पर मूर्ख हो जाना,
क्योंकि बुद्धिमत्ता अनेक मूर्खताओं के अनुभव से आया
करती है। तुम अचानक बुद्धिमान नहीं हो जाते हो। तुमको
चलना पडेगा, और भटकना पड़ेगा, और अनेक मूर्खतापूर्ण
कार्य करने पड़ेंगे। और इन सभी मूर्खतापूर्ण या दूसरे ढंग के
कृत्यों के द्वारा बुद्धिमत्ता का उदय होता है।
बुद्धिमत्ता एक सुगंध की भांति है, और मूर्खताओं के अनुभव
खाद की तरह कार्य करते हैं। उनसे दुर्गंध उठती है, लेकिन उनसे
सुंदर पुष्प आते हैं। इसलिए जीवन की खाद की उपेक्षा मत
करो, वरना तुम बुद्धिमत्ता के पुष्पों से चूक जाओगे। और तुम
एक इच्छा का एक ओर से दमन कर सकती हो, लेकिन तब यह
दूसरी ओर से उठने लगती है। तुम जीवन को धोखा नहीं दे
सकते।
मम्मी, उस छोटे विचित्र बच्चे ने कहा : स्कूल में बच्चे कहते
रहते हैं कि मेरा सिर बहुत बडा है। तुम्हारा सिर तो कोई
खास बड़ा नहीं है, मां ने कहा। उन शैतान बच्चों के बारे में
बस भूल जाओ और मेरे साथ बाजार चलो। मुझको दस पाउंड
आलू पांच पाउंड शलजम और दो गोभियां खरीदना है।
ठीक है, मम्मी। सब्जी रखने वाला थैला कहां है?
ओह, उसकी चिंता मत करो। बस अपनी टोपी का उपयोग
कर लेना।
इसलिए इस रास्ते से या उस रास्ते से.. .एक बार और सोचो
दस पाउंड आलू पांच पाउंड शलजम और दो गोभियां—और बस
अपनी टोपी प्रयोग कर लेना। तुम एक ओर से दमन कर सकती
हो, यह दूसरी ओर से उभर कर आ जाता है। कभी किसी
चीज का दमन मत करो। यदि काम वहा है तो इसके पहले कि
बहुत देर हो जाए इसे स्वीकार करो। इसको ही कहो, इसमें
उतर जाओ, इसे स्वीकार कर लो। यह परमात्मा की दी हुई
चीज है। इसमें कोई गहरा कारण होना चाहिए। इसमें गहरा
कारण है। कभी किसी ऐसे उत्तरदायित्व से बच कर मत
भागो जो परमात्मा ने तुमको दिया हुआ है, वरना तुम
विकसित न हो पाओगी। और अब इस शताब्दी में, इस
बीसवीं शताब्दी में ऐसे प्रश्न पूछना बस निरी मूर्खता है।
यह छह वर्षीय बालक पहली बार चिड़िया घर देखने गया
था, और जैसा कि होता है ढेर सारे हैरान करने वाले ‘सवाल
पूछे जा रहा था। पिताजी, हाथी के बच्चे कहां से आते हैं,
उसने पूछा। फिर उसने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा,
और यदि अब आपने अपनी पुरानी जल—पक्षी वाली
कहानी सुनाई तो मैं वास्तव में मान जाऊंगा कि आप निरे
पागल हैं।
वे मूर्खतापूर्ण दिन विदा हो चुके हैं जब लोग जीवन—
निषेधक विचारधाराओं, जीवन की निंदाओं के रूप में सोचा
करते थे। फ्रायड के बाद मनुष्य ने काम— भावना को अधिक
स्वाभाविक ढंग से स्वीकार कर लिया है। इस संसार में एक
बड़ी क्रांति घटित हो चुकी है।
अब निंदात्मक रूप में विचार करना समकालीन होना नहीं
है। अब कृष्णप्रिया का प्रश्न ठीक था, यदि उसने इसे पांच
सौ वर्ष पहले पूछा होता, लेकिन अब? असंगत है यह। और वह
भी मेरे आश्रम में?

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आज इतना ही।

शरीर

बुद्ध ने बत्तीस कुरूपताएं शरीर में गिनायी हैं। इन बत्तीस कुरूपताओं का स्मरण रखने का नाम कायगता—स्मृति है। पहली तो बात, यह शरीर मरेगा। इस शरीर में मौत लगेगी। यह पैदा ही बड़ी गंदगी से हुआ है।

मां के गर्भ में तुम कहां थे, तुम्हें पता है? मल—मूत्र से घिरे पड़े थे। उसी मल—मूत्र में नौ महीने बड़े हुए। उसी मल—मूत्र से तुम्हारा शरीर धीरे—धीरे निर्मित हुआ। फिर बुद्ध कहते हैं कि अपने शरीर में इन विषयों की स्मृति रखे—केश, रोम, नख, दांत, त्वक्, मांस, स्नायु, अस्थि, अस्थिमज्जा, यकृत, क्लोमक, प्लीहा, फुस्फुस, आत, उदरस्थ मल—मूत्र, पित्त, कफ, रक्त, पसीना, चर्बी, लार आदि। इन सब चीजों से भरा हुआ यह शरीर है, इसमें सौंदर्य हो कैसे सकता है!

सौंदर्य तो सिर्फ चेतना का होता है। देह तो मल—मूत्र का घर है। देह तो धोखा है। देह के धोखे में मत पड़ना, बुद्ध कहते हैं। इस बात को स्मरण रखना कि इसको तुम कितने ही इत्र से छिडको इस पर, तो भी इसकी दुर्गंध नहीं जाती। और तुम इसे कितने ही सुंदर वस्त्रों में ढांको, तो भी इसका असौंदर्य नहीं ढकता है। और तुम चाहे कितने ही सोने के आभूषण पहनो, हीरे—जवाहरात सजाओ, तो भी तुम्हारे भीतर की मांस—मज्जा वैसी की वैसी है।

जिस दिन चेतना का पक्षी उड़ जाएगा, तुम्हारी देह को कोई दो पैसे में खरीदने को राजी न होगा। जल्दी से लोग ले जाएंगे, मरघट पर जला आएंगे। जल्दी समाप्त करेंगे। घड़ी दो घडी रुक जाएगी देह तो बदबू आएगी। यह तो रोज नहाओ, धोओ, साफ करो, तब किसी तरह तुम बदबू को छिपा पाते हो। लेकिन बदबू बह रही है। बुद्ध कहते हैं, शरीर
तो कुरूप है। सौंदर्य तो चेतना का होता है। और सौंदर्य चेतना का जानना हो तो ध्यान मार्ग है।

और शरीर का सौंदर्य मानना हो, तो ध्यान को भूल जाना मार्ग है। ध्यान करना ही मत कभी, नहीं तो शरीर का असौंदर्य पता चलेगा। तुम्हें पता चलेगा, यह शरीर में यही सब तो भरा है। इसमें और तो कुछ भी नहीं है।

कभी जाकर अस्पताल में टंगे अस्थिपंजर को देख आना, कभी जाकर किसी मुर्दे का पोस्टमार्टम होता हो तो जरूर देख आना, देखने योग्य है, उससे तुम्हें थोड़ी अपनी स्मृति आएगी कि तुम्हारी हालत क्या है। किसी मुर्दे का पेट कटा हुआ देख लेना, तब तुम्हें समझ में आएगा कि कितना मल
—मूत्र भरे हुए हम चल रहे हैं। यह हमारे शरीर की स्थिति है।
बुद्ध कहते हैं, इस स्थिति का बोध रखो। यह बोध रहे तो धीरे — धीरे शरीर से तादात्म्य टूट जाता है और तुम उसकी तलाश में लग जाते हो जो शरीर के भीतर छिपा है, जो परमसुंदर है। उसे सुंदर करना नहीं होता, वह सुंदर है। उसे
जानते ही सौंदर्य की वर्षा हो जाती है। और शरीर को सुंदर करना पड़ता है, क्योंकि शरीर सुंदर नहीं है। कर—करके
भी सुंदर होता नहीं है। कभी नहीं हुआ है। कभी नहीं हो सकेगा।

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प्रेम को कैसे मंदिर बनाओगे?

प्रेम को कैसे मंदिर बनाओगे?

आधिपत्य मत करना जिससे प्रेम करो।
जिससे प्रेम करो उस प्रेम के आस-पासर् ईष्या को खड़े मत होने देना। जिसको प्रेम करो उससे अपेक्षा मत करना कुछ; दे सको, देना,
मांगना मत। और तुम पाओगे, प्रेम रोज गहरा होता है, रोज ऊपर उठता है। और तुम पाओगे कि धीरे-धीरे, धीरे-धीरे नये पंख उगने लगे तुम्हारे जीवन में; चेतना नयी यात्रा पर जाने के लिए समर्थ होने लगी। लेकिन इन भूलों के प्रति सजग रहना। ये भूलें बिलकुल सामान्य हैं और तुम प्रेम में पड़ते भी नहीं कि ये भूलें शुरू
हो जाती हैं। तुम अपेक्षा शुरू कर देते हो।
जहां अपेक्षा की वहां सौदा शुरू हो गया;
प्रेम न रहा।

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जीवन नदी जैसा हे

बुद्ध ने कहा हे-
जीवन नदी जैसा हे , यहां प्रतिपल सब बह रहा हे ।
ऐसा ही जीवन का प्रवाह हे
जो आये उसे अंगीकार करो
जो जाये उसे अलविदा करो
कुछ पकड़ के मत रखो
ऐसा आदमी कभी दुखी नहीं होता।

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उर्जा

तीन शब्द समझ लेना ! एक हैं : काम !
काम हैं : सुख नीचे की तरफ बहता हुआ !
दूसरा शब्द हैं : प्रेम ! प्रेम हैं : सुख मध्य मैं
अटका हुआ :न नीचे जा रहा हैं न ऊपर
जा रहा हैं ! और तीसरा शब्द हैं
प्रार्थना ! प्रार्थना हैं : सुख ऊपर
जाता हुआ ! उर्जा वही हैं काम मैं वही
उर्जा नीचे जा रही हैं , प्रेम मैं वही
उर्जा बीच मैं थिर हो जाती हैं ,
प्रार्थना मैं वही उर्जा पंख खोल देती
हैं ,आकाश की तरफ उड़ने लगती हैं !
इसलिए मैंने कहा हैं ,सम्भोग और
समाधि संयुक्त हैं ,एक ही उर्जा है ,एक
ही सीडी है ! नीचे की तरफ जायो तो
सम्भोग ऊपर की तरफ जाओ तो
समाधी : और दोनों के मध्य मैं प्रेम है !
प्रेम द्वार है ! प्रेम दोनों का द्वार है
,प्रेम सम्भोग का भी द्वार है ! अगर
तुम्हारी उर्जा नीचे की तरफ जा रही
है तो प्रेम सम्भोग का द्वार बन
जायेगा ! अगर तुम्हारी उर्जा उपर की
तरफ जा रही है तो प्रेम समाधी का
द्वार बन जायेगा ! प्रेम बड़ा अद्भुत सेतु
है –

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