एक औरत को आखिर क्या चाहिए होता है?

राजा हर्षवर्धन युद्ध में हार गए।
हथकड़ियों में जीते हुए पड़ोसी राजा के सम्मुख पेश किए गए। पड़ोसी देश का राजा अपनी जीत से प्रसन्न था और उसने हर्षवर्धन के सम्मुख एक प्रस्ताव रखा…

यदि तुम एक प्रश्न का जवाब हमें लाकर दे दोगे तो हम तुम्हारा राज्य लौटा देंगे, अन्यथा उम्र कैद के लिए तैयार रहें।

प्रश्न है.. एक स्त्री को सचमुच क्या चाहिए होता है ?

इसके लिए तुम्हारे पास एक महीने का समय है हर्षवर्धन ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया..

वे जगह जगह जाकर विदुषियों, विद्वानों और तमाम घरेलू स्त्रियों से लेकर नृत्यांगनाओं, वेश्याओं, दासियों और रानियों, साध्वी सब से मिले और जानना चाहा कि एक स्त्री को सचमुच क्या चाहिए होता है ? किसी ने सोना, किसी ने चाँदी, किसी ने हीरे जवाहरात, किसी ने प्रेम-प्यार, किसी ने बेटा-पति-पिता और परिवार तो किसी ने राजपाट और संन्यास की बातें कीं, मगर हर्षवर्धन को सन्तोष न हुआ।

महीना बीतने को आया और हर्षवर्धन को कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला..

किसी ने सुझाया कि दूर देश में एक जादूगरनी रहती है, उसके पास हर चीज का जवाब होता है शायद उसके पास इस प्रश्न का भी जवाब हो..

हर्षवर्धन अपने मित्र सिद्धराज के साथ जादूगरनी के पास गए और अपना प्रश्न दोहराया।

जादूगरनी ने हर्षवर्धन के मित्र की ओर देखते हुए कहा.. मैं आपको सही उत्तर बताऊंगी परंतु इसके एवज में आपके मित्र को मुझसे शादी करनी होगी ।

जादूगरनी बुढ़िया तो थी ही, बेहद बदसूरत थी, उसके बदबूदार पोपले मुंह से एक सड़ा दाँत झलका जब उसने अपनी कुटिल मुस्कुराहट हर्षवर्धन की ओर फेंकी ।

हर्षवर्धन ने अपने मित्र को परेशानी में नहीं डालने की खातिर मना कर दिया, सिद्धराज ने एक बात नहीं सुनी और अपने मित्र के जीवन की खातिर जादूगरनी से विवाह को तैयार हो गया

तब जादूगरनी ने उत्तर बताया..

“स्त्रियाँ, स्वयं निर्णय लेने में आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं | ”

यह उत्तर हर्षवर्धन को कुछ जमा, पड़ोसी राज्य के राजा ने भी इसे स्वीकार कर लिया और उसने हर्षवर्धन को उसका राज्य लौटा दिया

इधर जादूगरनी से सिद्धराज का विवाह हो गया, जादूगरनी ने मधुरात्रि को अपने पति से कहा..

चूंकि तुम्हारा हृदय पवित्र है और अपने मित्र के लिए तुमने कुरबानी दी है अतः मैं चौबीस घंटों में बारह घंटे तो रूपसी के रूप में रहूंगी और बाकी के बारह घंटे अपने सही रूप में, बताओ तुम्हें क्या पसंद है ?

सिद्धराज ने कहा.. प्रिये, यह निर्णय तुम्हें ही करना है, मैंने तुम्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया है, और तुम्हारा हर रूप मुझे पसंद है ।

जादूगरनी यह सुनते ही रूपसी बन गई, उसने कहा.. चूंकि तुमने निर्णय मुझ पर छोड़ दिया है तो मैं अब हमेशा इसी रूप में रहूंगी, दरअसल मेरा असली रूप ही यही है।

बदसूरत बुढ़िया का रूप तो मैंने अपने आसपास से दुनिया के कुटिल लोगों को दूर करने के लिए धरा हुआ था ।

अर्थात, सामाजिक व्यवस्था ने औरत को परतंत्र बना दिया है, पर मानसिक रूप से कोई भी महिला परतंत्र नहीं है।

इसीलिए जो लोग पत्नी को घर की मालकिन बना देते हैं, वे अक्सर सुखी देखे जाते हैं। आप उसे मालकिन भले ही न बनाएं, पर उसकी ज़िन्दगी के एक हिस्से को मुक्त कर दें। उसे उस हिस्से से जुड़े निर्णय स्वयं लेने दें।

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दूसरे की उत्सुकता अहंकार का पोषण है

मैं एक विश्वविद्यालय में शिक्षक था। एक दिन बैठा था प्रिंसिपल के कमरे में, कुछ बात करता था, कि एक युवती आयी और उसने शिकायत की कि किसी ने उसे कंकड़ मार दिया। मैं बैठा था तो प्रिंसिपल ने मुझसे कहा कि अब आप ही बताइए क्या करें? यह रोज का उपद्रव है! मैंने उस लड़की की तरफ देखा, मैंने कहा, कंकड़ कितना बड़ा था? उसने कहा, जरा सा था। मैंने कहा, उसने जरा सा मारा यही आश्चर्य है, तुझे बडी चट्टान मारनी थी! तू इतनी सज संवरकर आयी है, उसने कंकड़ मारा यह बात जंचती नहीं ठीक! इतने सज संवरकर विश्वविद्यालय आने की जरूरत क्या थी? यहां कोई सौंदर्य प्रतियोगिता हो रही है? इतने चुस्त कपड़े पहनकर, इतने आभूषण लादकर, इतने बालों को संवारकर, यहां तू पढने आयी है या किसी बाजार में!

फिर मैंने उस युवती से पूछा कि मैं एक बात और पूछना चाहता हूं तू किसी दिन इतना सज संवरकर आए और कोई कंकड़ न मारे, तो तेरे मन को दुख होगा कि सुख? पहले तो वह बहुत चौंकी मेरी बात से, फिर सोचने भी लगी, फिर उसने कहा कि शायद आप ठीक ही कहते हैं। क्योंकि मैंने देखा विश्वविद्यालय में जिन लड़कियों के पीछे लोग कंकड़ पत्थर फेंकते हैं, वे दुखी हैं।

कम से कम दिखलाती हैं कि दुखी है, और जिनके पीछे कोई कंकड़ पत्थर नहीं फेंकता, वे बहुत दुखी हैं, महादुखी हैं कि कोई कंकड़ पत्थर फेंकने वाला मिलता ही नहीं। कोई चिट्ठी पत्री भी नहीं लिखता। जिनको चिट्ठी पत्री लिखी जाती है वे शिकायत कर रही हैं और जिनको चिट्ठी पत्री नहीं लिखी जाती वे शिकायत कर रही हैं। मन बड़ा विरोधाभासी है।

लेकिन संसार में ठीक है, संसार विरोधाभास है। वहां हम कुछ चाहते हैं, कुछ दिखलाते है। कुछ दिखलाते हैं, कुछ और चाहते हैं। अगर तुम अपने मन को देखोगे तो बड़े चकित हो जाओगे कि तुमने कैसे सूक्ष्म जाल बना रखे हैं। तुम निकलते इस ढंग से हो कि प्रत्येक व्यक्ति तुम में कामातुर हो जाए, और अगर कोई कामातुर हो जाए तो तुम नाराज होते हो। आयोजन उसी का करते हो, फिर जब सफलता मिल जाए तब तुम बड़े बेचैन होते हो। और सफलता करने के लिए घर से बड़ी व्यवस्था। करके नकले थे। अगर कोई न देखे तुम्हें, रास्ते से तुम अपना सारा सौंदर्य प्रसाधन करके नकल गए और किसी ने भी नजर न डाली, तो भी तुम उदास घर आओगे कि बात क्या है? मामला क्या है? लोग क्या मुझमें उत्सुक ही नहीं रहे?

दूसरे की उत्सुकता अहंकार का पोषण है। तुम्हें अच्छा लगता है जब दूसरे लोग उत्‍सुक होते हैं, तुम मूल्यवान मालूम होते हो। जिनके भीतर कोई मूल्य नहीं है, वे इसी मूल्य का अपने लिए धोखा पैदा करते हैं। दूसरे लोग उत्सुक हैं, जरूर मूल्‍यवान होना चाहिए। इतने लोगों ने मेरी तरफ आंख उठाकर देखा, जरूर मुझमें कुछ खूबी होनी चाहिए। तुम्हें खुद अपनी खूबी का कुछ पता नहीं है, है भी नहीं खूबी एक झूठा भरोसा इससे मिलता है कि अगर खूबी न होती तो इतने लोग मुझसे उत्‍सुक क्यों होते? जरूर मैं सुंदर होना चाहिए, नहीं तो इतने लोग उत्सुक हैं!

तुम्‍हें अपने सौंदर्य पर खुद तो कोई आस्था नहीं है, तुम दूसरों के मंतव्य इकट्ठे करते हो। संसार पागलों की दुनिया है।

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विवाहित जीवन

प्रश्न :विवाहित जीवन के संबंध में आपके क्या खयाल हैं?

ओशो: मैं विवाहित नहीं हूं, इससे ही मेरे क्या खयाल हैं, तुम्हें समझ में आ जाना चाहिए। इससे बड़ा वक्तव्य और क्या होगा?
तुम मुझसे पूछते हो कि विवाहित जीवन के संबंध में आपके क्या खयाल हैं? पहली तो बात, अविवाहित आदमी से ऐसा पूछना नहीं चाहिए। विवाहित आदमी से पूछना चाहिये। हालांकि विवाहित आदमी भी…अगर पत्नी मौजूद हो तो पति सच नहीं बोल सकता, अगर पति मौजूद हो तो पत्नी सच नहीं बोल सकती, या डर भी हो कि दूसरे को पता चल जाएगा तो भी सच नहीं बोला जा सकता।

टालस्टाय, चैखव, तुर्गनेव रूस के तीन बड़े विचारशील लेखक एक बगीचे में बैठकर गपशप कर रहे थे। बात विवाह की उठ गई। बात भी कहां है और इस दुनिया में! अब बोलो यहां तुम आध्यात्मिक सत्संग करने आये, बात विवाह की उठा ली! विवाह का भूत तुम्हारे पीछे पड़ा होगा। विवाह की बात उठ गई। चैखव ने कहा: तुर्गनेव से कि तुम्हारा क्या विचार है? तुर्गनेव ने अपना विचार बताया। तुर्गनेव ने पूछा चैखव से, तुम्हारा क्या विचार है? चैखव ने अपना विचार बताया। फिर दोनों ने पूछा टालस्टाय से, आप चुप क्यों हो? आप क्यों नहीं बोलते? उन्होंने कहा, मैं तब बोलूंगा जब मेरा एक पैर कब्र में। जल्दी से बोलकर मैं कब्र में समा जाऊंगा, क्योंकि मुझे पता है कि तुम दोनों मेरी पत्नी से भी मिलते-जुलते हो। मेरा मन्तव्य जल्दी पहुंच जायेगा उस तक। अभी मैं सत्य नहीं बोल सकता। सत्य तो मैं सिर्फ कब्र में जाते वक्त ही बोलूंगा, आखिरी वक्त कह दूंगा कि यह है सत्य।

एक ट्रेन में दो यात्री साथ बैठे हैं। एक ने पूछा दूसरे से: विवाहित जीवन के बारे में तुम्हें मेरे विचार मालूम हैं? दूसरे यात्री ने कहा: क्या तुम विवाहित हो?
पहला यात्री: हां।
तो दूसरे ने कहा: तो फिर मालूम हैं। अब और बताने को क्या है?
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी उससे पूछ रही थी: क्या तुमने कभी सोचा मुल्ला कि यदि मेरी शादी किसी और से हो जाती तो कितना अच्छा होता? मुल्ला ने उत्तर दिया: नहीं, मैं किसी व्यक्ति का बुरा क्यों चाहने लगा!
एक आदमी मुझसे आकर पूछा कि ओशो, आपके आश्रम का कोई युवक नियम भंग करके शादी कर ले तो आप उसे क्या सजा देते हैं? मैंने कहा: कुछ नहीं। उसने कहा: क्यों? मैंने कहा: वही उसकी सजा है। और बेचारे को सजा! इतना पर्याप्त है, अब भोगेगा।

अकेले लोग रह नहीं सकते, साथ चाहिए। साथ भी रह नहीं सकते, क्योंकि जब अकेले ही नहीं रह सकते तो साथ कैसे रह सकेंगे? जब अपने साथ न रह सके तो दूसरे के साथ कैसे रह सकेंगे? दो व्यक्ति जो दोनों ही अकेले रहने में असमर्थ हैं, जब मिल जायेंगे तो उनके दुखों में जोड़ ही नहीं होगा, गुणनफल हो जाता है। और यही हो रहा है। विवाह के नाम पर ऐसे व्यक्ति साथ हो लेते हैं, जिनको अभी अकेले में जीना भी नहीं आता। तो साथ जीना तो जरा और कुशलता की बात है, और कला की बात है।

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प्रेम का पाने से क्या संबंध है?

प्रश्न – मैंने कभी किसी को प्रेम किया था, लेकिन उसे पाने में असफल रहा। क्या कभी मेरा उससे मिलन होगा?

प्रेम का पाने से क्या संबंध है? मोह का पाने से संबंध है। मोह न पाए तो तड़फता है। प्रेम तो कर लिया और भर गया; पाने की क्या बात है? तुम प्रेम और मोह में भेद नहीं समझ पा रहे हो। तुमने मोह को प्रेम समझा है।

प्रेम कभी असफल नहीं होता–हो ही नहीं सकता। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रेम तुम करोगे तो वह तुम्हें मिल ही जाएगा। उसको मैं सफलता नहीं कहता। प्रेम के तो करने में ही सफलता है।लेकिन तुम चाहते होओगे कि यह स्त्री मेरी पत्नी बने। तुम सोचते हो यह प्रेम है? तुम कब्जा करना चाहते थे। तुम इस स्त्री को मेरी ही हो, और किसी की न हो, इस तरह की सील-मोहर लगाना चाहते थे। तुम स्वामी बनना चाहते थे। तुम इस स्त्री को संपत्ति बनाना चाहते थे।

अक्सर ऐसा हो जाता है कि जिसको तुम पाना चाहते थे और नहीं पा सके, तो तुम्हारा अहंकार तड़फता रहता है, क्योंकि तुम्हें चोट लगी, तुम नहीं पा सके। तुम हार गए। तुम अपनी विजय करके दिखाना चाहते थे और विजय नहीं हो पाई। वह घाव तुम में तड़फता है। यह अहंकार ही है, यह प्रेम नहीं है !

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|| ओशो ||

प्रेम और दुख

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आप एक स्त्री के प्रेम में पड़ गये हैं,
एक पुरुष के प्रेम में पड़ गये हैं।
आपने कभी खयाल नहीं किया होगा
कि सभी प्रेम इतनी

कठिनाइयों में क्यों ले जाते हैं,
और सभी प्रेम अंततः
दुख क्यों बन जाते हैं।

उसका कारण है।
किसी का चेहरा आपको सुंदर लगा,
यह आंख का रस है।

अगर आंख बहुत प्रभावी सिद्ध हो
जाये तो आप प्रेम में पड़ जायेंगे।

लेकिन कल उसकी गंध शरीर की
आपको अच्छी नहीं लगती,

तब नाक इनकार करने लगेगी।
आप उसके शरीर को छूते है,
लेकिन उसके शरीर की ऊष्मा
आपके हाथ को अच्छी नहीं लगती,
तो हाथ इनकार करने लगेंगे।

आपकी सारी इंद्रियों के बीच
कोई ताल—मेल नहीं है,
इसलिए प्रेम विसंवाद हो जाता है।
एक इंद्रिय के आधार पर
आदमी चुन लेता है,

बाकी इंद्रियां धीरे— धीरे
अपना—अपना स्वर देना
शुरू करेंगी और तब एक ही
व्यक्ति के प्रति कोई इंद्रिय
अच्छा अनुभव करती है,
दूसरी इंद्रिय बुरा अनुभव करती है।
आपके मन में हजार विचार एक
ही व्यक्ति के प्रति हो जाते हैं।

और हममें से अधिक लोग
आंख का इशारा मान
कर चलते हैं।

क्योंकि आंख बडी प्रभावी हो गयी है।

हमारे चुनाव में,
नब्बे प्रतिशत आंख काम करती है।
हम आंख की मान लेते हैं,
दूसरी इंद्रियों की हम कोई फिक्र नहीं करते।
आज नहीं कल कठिनाई शुरू हो जाती है।
क्योंकि दूसरी इंद्रियां भी
असर्ट करना शुरू करती है,
अपने वक्तव्य देना शुरू करती हैं।

आंख की गुलामी मानने
को कान राजी नहीं है।
इसलिए आंख ने कितना ही
कहां हो कि चेहरा सुंदर है,
इस कारण वाणी को कान
मान लेगा कि सुंदर है,
यह आवश्यक नहीं है।
आंख की आवाज को,
आंख की मालकियत को,
नाक मानने को राजी नहीं है।
आंख ने कहां हो कि शरीर सुंदर है,
लेकिन नाक तो कहेगी कि
शरीर से जो गंध आती है,
अप्रीतिकर है।

फिर क्या होगा?
एक ही व्यक्ति के प्रति पांचों
इंद्रियों के अलग—अलग वक्तव्य
जटिलता पैदा कर देते हैं।
यह जो जटिलता है,
केवल उसी व्यक्ति में नहीं होती,
जिसका भीतर मालिक जगा होता है।

तो फिर पांचों इंद्रियों को
जोडने वाला एक केंद्र भी होता है।
हमारे भीतर कोई केंद्र नहीं है।
हमारी हर इंद्रिय मालकियत जाहिर करती है।
और हर इंद्रिय का वक्तव्य आखिरी है।
कोई दूसरी इंद्रिय उसके
वक्तव्य को काट नहीं सकती।
हम सभी इंद्रियों के वक्तव्य
इकट्ठे करके एक विसंगतियों
का ढेर हो जाते हैं।

हमारे भीतर—जिसे हम प्रेम करते है—
उसके प्रति घृणा भी होती है।
क्योंकि एक इंद्रिय प्रेम करती है,
एक घृणा करती है।
और हम इसमें कभी
ताल—मेल नहीं बिठा पाते।
तो ज्यादा से ज्यादा हम यही करते है
कि हम हर इंद्रिय को रोटेशन
में मौका देते रहते है।
हमारी इंद्रियां रोटरी क्लब के सदस्य है।

कभी आंख को मौका देते है
तो वह मालकियत कर लेती है,
तब। कभी कान को मौका देते है,
तब वह मालकियत कर लेता है।
लेकिन इनके बीच कभी कोई
ताल—मेल निर्मित नहीं हो पाता।

कोई संगति, कोई सामंजस्य,
कोई संगीत पैदा नहीं हो पाता।
इसलिए जीवन हमारा एक दुख हो जाता है।

स्त्री मनोविज्ञान

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जिस स्त्री से तुम बात कर रहे हो, अगर वह तुमसे प्रेम में पड़ने को राजी है, तो वह आगे की तरफ झुकी होकर तुमसे बात करेगी। अगर वह तुमसे राजी नहीं है, तो तुम्हें समझ जाना चाहिए, वह हमेशा पीछे की तरफ झुकी होगी। वह दीवाल खोजेगी; दीवाल से टिककर खड़ी हो जाएगी। वह यह कह रही है कि यहां दीवाल है।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जो स्त्री तुमसे संभोग करने को उत्सुक होगी, वह हमेशा पैर खुले रखकर बैठेगी तुमसे बात करते वक्त। वह स्त्री को भी पता नहीं होगा। अगर वह संभोग करने को उत्सुक नहीं है, तो वह पैरों को एक—दूसरे के ऊपर रखकर बैठेगी। वह खबर दे रही है कि वह बंद है, तुम्हारे लिए खुली नहीं है। इस पर हजारों प्रयोग हुए हैं और यह हर बार सही बात साबित हुई है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं, तुम एक होटल में प्रवेश करते हो; एक स्त्री बैठी है, वह तुम्हें देखती है। अगर वह एक बार देखती है, तो तुममें उत्सुक नहीं है। एक बार तो आदमी औपचारिक रूप से देखते हैं, कोई भी घुसा, तो आदमी देखते हैं। लेकिन अगर स्त्री तुम्हें दुबारा देखे, तो वह उत्सुक है।

और धीरे—धीरे जो डान जुआन तरह के लोग होते हैं, जो स्त्रियों के पीछे दौड़ते रहते हैं, वे कुशल हो जाते हैं इस भाषा को समझने में। वह स्त्री को पता ही नहीं कि उसने खुद उनको निमंत्रण दे दिया।

दुबारा अगर स्त्री देखे, तो वह तभी देखती है। पुरुष तो पचीस दफे देख सकता है स्त्री को। उसके देखने का कोई बहुत मूल्य नहीं है। वह तो ऐसे ही देख सकता है। कोई कारण भी न हो, तो भी, खाली बैठा हो, तो भी। लेकिन स्त्री बहुत सुनियोजित है, वह तभी दुबारा देखती है, जब उसका रस हो। अन्यथा वह नहीं देखती। क्योंकि स्त्री को देखने में बहुत रस ही नहीं है।

स्त्रियां पुरुषों के शरीर को देखने में उत्सुक नहीं होती हैं। वह स्त्रियों का गुण नहीं है। स्त्रियों का रस अपने को दिखाने में है, देखने में नहीं है। पुरुषों का रस देखने में है, दिखाने में नहीं है। यह बिलकुल ठीक है, तभी तो दोनों का मेल बैठ जाता है। आधी—आधी बीमारियां हैं उनके पास, दोनों मिलकर पूर्ण बीमारी बन जाते हैं।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं, स्त्रियां एक्झीबीशनिस्ट हैं, प्रदर्शनवादी हैं। पुरुष वोयूर हैं, वे देखने में रस लेते हैं। इसलिए स्त्री दुबारा जब देखती है, तो इसका मतलब है कि वह इंगित कर रही है, संकेत दे रही है कि वह तैयार है, वह उत्सुक है, वह आगे बढ़ने को राजी है। तुम अगर तीन सेकेंड तक, मनोवैज्ञानिक कहते हैं, किसी स्त्री की तरफ देखो, तो वह नाराज नहीं होगी। तीन सेकेंड! इससे ज्यादा देखा, तो बस वह नाराज हो जाएगी। तीन सेकेंड तक सीमा है, उस समय तक औपचारिक देखना चलता है। लेकिन तीन सेकेंड से ज्यादा देखा कि तुमने उन्हें घूरना शुरू कर दिया, लुच्चापन शुरू हो गया।

लुच्चे का मतलब होता है, घूरकर देखने वाला। लुच्चा शब्द बनता है लोचन से, आंख से। जो आंख गड़ाकर देखता है, वह लुच्चा। लुच्चे का और कोई बुरा मतलब नहीं होता। जरा आंख उनकी संयम में नहीं है, बस, इतना ही और कुछ नहीं।

शब्द का तो वही मतलब होता है, जो आलोचक का होता है। लुच्चे शब्द का वही अर्थ होता है, जो आलोचक का होता है। आलोचक भी घूरकर देखता है चीजों को। कवि कविता लिखता है, आलोचक कविता को घूरकर देखता है। वह लुच्चापन कर रहा है कविता के साथ।

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प्रेम || जिसके सामने मृत्यु समर्पण करती है

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प्रेम एकमात्र तत्व है,
जिससे मृत्यु हारती है;
जिसके सामने मृत्यु समर्पण करती है।
इसे समझना।
इसीलिये जिसका हृदय प्रेम से भरा है
उसके जीवन में भय विसर्जित हो जाता है।
क्योंकि सभी भय मृत्यु का भय है।
और जिसके जीवन में भय है
उसके जीवन में प्रेम का अंकुरण नहीं हो पाता।
भयभीत व्यक्ति धन इकट्ठा करेगा,
पद-प्रतिष्ठा की खोज करेगा;
लेकिन प्रेम से बचेगा।
प्रेमी सब लुटा देगा प्रेम के ऊपर,
सब निछावर कर देगा–पद भी,
प्रतिष्ठा भी, धन भी,
जरूरत पड़े तो जीवन भी।
सिर्फ प्रेम ही जानता है,
जीवन का समर्पण भी किया जा सकता है ।
क्योंकि प्रेम को पता है कि
जीवन के बाद भी एक और जीवन है;
कि जीवन को छोड़कर भी शाश्वत
जीवन शेष ही रह जाता है।

अपेक्षा

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दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करना बंद करो, क्योंकि यह एक मात्र ढंग है जिससे तुमआत्महत्या कर सकते हो। तुम यहां किसी की भी अपेक्षाएं पूरी करने के लिए नहीं हो और कोई भी यहां तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करने के लिए नहीं हैं। दूसरों की अपेक्षाओं के कभी भी शिकार मत बनो और किसी दूसरे को अपनी अपेक्षाओं का शिकार मत बनाओ।यही है जिसे मैं निजता कहता हूं। अपनी निजता का सम्मान करो और दूसरों की निजता का भी सम्मान करो। कभी भी किसी के जीवन में हस्तक्षेप मत करो और किसी को भी अपनेजीवन में हस्तक्षेप मत करने दो। सिर्फ तब ही एक दिन तुम आध्यात्मिकता में विकसितहो सकते हो।वर्ना, नन्यानबे प्रतिशत लोग आत्महत्या करते हैं। उनका सारा जीवन और कुछ नहीं बस धीमी गति से आत्महत्या है। यह अपेक्षा और वह अपेक्षा पूरी करते हुए…किसी दिन पिता, किसी दिन माता, किसी दिन पत्नी, पति, फिर बच्चे आते हैं–वे अपेक्षाएं करते हैं। फिर समाज आ जाता है, पंडित और राजनेता। चारों तरफ सभी अपेक्षाएं कर रहेहैं। और तुम बेचारे वहां हो, बस बेचारे मनुष्य–और सारी दुनिया तुमसे अपेक्षा कर रही है कि यह करो और वह करो। और तुम दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते, क्योंकि वे बड़ी विरोधाभासी हैं।तुम दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करते हुए पागल हो गए हो। और तुमने किसी की भी अपेक्षा पूरी नहीं की है। कोई भी प्रसन्न नहीं है। तुम हार गए, नष्ट हो गए और कोईभी प्रसन्न नहीं है। जो लोग स्वयं के साथ खुश नहीं हैं वे प्रसन्न नहीं हो सकते।तुम कुछ भी कर लो, वे तुम्हारे साथ अप्रसन्न होने के मार्ग ढूंढ़ लेंगे, क्योंकि वे प्रसन्न नहीं हो सकते।प्रसन्नता एक कला है जो तुम्हें सीखनी होती है। इसका तुम्हारे करने या न करने सेकुछ लेना देना नहीं है।सुखी करने की जगह, प्रसन्न होने की कला सीखो।

!!प्रेम!!

प्रेम दूसरे की आंखों में अपने को देखना है।
दूसरा कोई उपाय नहीं है।
जब किसी की आंखें तुम्हारे लिए
आतुरता से भरती हैं,
कोई आंख तुम्हें ऐसे देखती है कि
तुम पर सब कुछ न्योछावर कर दे,
किसी आंख में तुम ऐसी झलक देखते हो कि
तुम्हारे बिना उस आंख के भीतर छिपा हुआ
जीवन एक वीरान हो जाएगा,
तुम ही हरियाली हो, तुम ही हो वर्षा के मेघ;
तुम्हारे बिना सब फूल सूख जाएंगे,
तुम्हारे बिना बस रेगिस्तान रह जाएगा;
जब किसी आंख में तुम अपने जीवन की
ऐसी गरिमा को देखते हो,
तब पहली बार तुम्हें पता चलता है कि
तुम सार्थक हो।
तुम कोई आकस्मिक संयोग नहीं हो इस पृथ्वी पर;
तुम कोई दुर्घटना नहीं हो।
तुम्हें पहली बार अर्थ का बोध होता है;
तुम्हें पहली बार लगता है कि
तुम इस विराट लीला में सार्थक हो,
सप्रयोजन हो; इस विराट खेल में तुम्हारा भाग है;
यह मंच तुम्हारे बिना अधूरी होगी;
यहां तुम न होओगे तो कुछ कमी होगी;
कम से कम एक हृदय तो तुम्हारे बिना
रेगिस्तान रह जाएगा,
कम से कम एक हृदय में तो
तुम्हारे बिना सब काव्य खो जाएगा;
फिर कोई वीणा न बजेगी।
ऐसा एक व्यक्ति की आंखों में,
उसके हृदय में झांक कर तुम्हें
पहली बार तुम्हारे मूल्य का पता चलता है।
अन्यथा तुम्हें कभी मूल्य का पता न चलेगा

Just for U (2)

The woman

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The woman is the earth.

You are rooted in woman.

You come out of the womb.

You come out of it –
and, in one way,
one never comes out of it.

Something remains rooted.
Hence so much attraction to women.

In fact the sexual penetration
is nothing but a search
again for the womb.

Now you cannot go
into the womb totally
so you penetrate sexually.

It is a search for the womb,
a search for the roots.